संभल में जामा मस्जिद सर्वे के दौरान भड़की हिंसा की आग अब कानूनी गलियारों में एक नई जंग का रूप ले चुकी है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा तत्कालीन सीओ और वर्तमान एएसपी अनुज चौधरी सहित पंद्रह से अधिक पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश ने विभाग में खलबली मचा दी है। यह पूरा मामला आलम नामक युवक की मौत से जुड़ा है, जिसके पिता यामीन ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। यामीन का आरोप है कि 24 नवंबर 2024 को जब उनका बेटा रस्क बेचने घर से निकला था, तब पुलिस की गोलियों का शिकार हो गया। कोर्ट ने इस दलील को गंभीरता से लेते हुए रिपोर्ट दर्ज करने का निर्देश दिया, लेकिन पुलिस प्रशासन के तेवर कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। संभल पुलिस इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट जाने की तैयारी में है, जिससे यह साफ है कि आने वाले दिनों में पुलिस और न्यायपालिका के बीच इस मामले को लेकर खींचतान और बढ़ेगी।
बैलिस्टिक रिपोर्ट और मास्टरमाइंड की थ्योरी पर पुलिस का बचाव
संभल के पुलिस कप्तान कृष्ण कुमार ने इस मामले में पुलिस का पक्ष बेहद मजबूती से रखा है। उनका कहना है कि हिंसा की विस्तृत न्यायिक जांच पहले ही की जा चुकी है, जिसमें पुलिस की ओर से जानबूझकर गोली चलाने का कोई साक्ष्य सामने नहीं आया है। पुलिस का सबसे बड़ा तर्क बैलिस्टिक रिपोर्ट पर आधारित है। एसपी का दावा है कि मृतक आलम के शरीर से जो गोली बरामद हुई है, वह 7.65 एमएम बोर की है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उत्तर प्रदेश पुलिस इस बोर के हथियारों का इस्तेमाल ही नहीं करती। पुलिस का आरोप है कि यह गोली हिंसा के मास्टरमाइंड शारिक साटा गिरोह के गुर्गों द्वारा चलाई गई थी। पुलिस ने गिरफ्तारी के दौरान वे हथियार और कारतूस भी बरामद करने का दावा किया है, जिससे यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि मौत पुलिस की गोली से नहीं बल्कि उपद्रवियों की आपसी गोलीबारी या साजिश का परिणाम थी।
थ्री लेयर सुरक्षा और दावों की हकीकत पर सवाल
पुलिस प्रशासन ने अदालत में युवक की मौजूदगी पर भी सवाल खड़े किए हैं। प्रशासन का तर्क है कि सर्वे वाले दिन जामा मस्जिद के चारों ओर सुरक्षा का अभेद्य घेरा था और धारा 163 लागू थी। जब बाजार पूरी तरह बंद था और आम लोगों की आवाजाही पर पाबंदी थी, तो कोई व्यक्ति सामान से लदा ठेला लेकर संवेदनशील क्षेत्र तक कैसे पहुंच सकता था। पुलिस इसे एक सोची-समझी कहानी करार दे रही है। गौरतलब है कि इस हिंसा में चार लोगों की जान गई थी और उनतीस पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए थे। अब तक की कार्रवाई में पुलिस ने सांसद जियाउर्रहमान बर्क समेत कई लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की है। ऐसे में पुलिस का मानना है कि दंगाइयों पर कार्रवाई करने वाले अधिकारियों को निशाना बनाना मनोबल गिराने जैसा है। अब सबकी नजरें उच्च न्यायालय पर टिकी हैं कि वह निचली अदालत के इस आदेश पर क्या रुख अपनाता है।
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