उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे व्यस्त केंद्र, भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश मुख्यालय पर इन दिनों एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ है। जो गलियारे हमेशा कार्यकर्ताओं और टिकटार्थियों की भीड़ से गुलजार रहते थे, वहां अब परिंदा भी पर मारने से हिचकिचा रहा है। अचानक ऐसा क्या हुआ कि पार्टी ने अपने ही दिग्गजों और जन प्रतिनिधियों के लखनऊ आने पर मुहर लगा दी? छह फरवरी की वह रहस्यमयी तारीख क्या है, जिसने पूरी सरकार और संगठन को अपनी प्राथमिकताओं को बदलने पर मजबूर कर दिया है? सत्ता के गलियारों में यह सन्नाटा किसी तूफान के आने से पहले की शांति की तरह महसूस हो रहा है, जिसने राजनीतिक विश्लेषकों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है।
वार रूम का गुप्त मिशन और बंद कमरों में बनती रणनीति
पार्टी कार्यालय के भीतर के नजारे पूरी तरह बदल चुके हैं और अब वहां केवल एक 'वार रूम' की सक्रियता दिखाई दे रही है। बंद दरवाजों के पीछे वालंटियरों की एक पूरी फौज तैनात की गई है, जो सीधे प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों के डेटा को खंगाल रही है। संगठन के बड़े अधिकारियों की नजरें स्क्रीन पर टिकी हैं और वहां से सीधे आदेश उन विधायकों को जा रहे हैं, जिन्हें लखनऊ आने के बजाय अपने क्षेत्र में ही 'नजरबंद' रहने को कहा गया है। यह पूरा गुप्त मिशन गहन मतदाता पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर है। जिन इलाकों में नए नाम जोड़ने की रफ्तार सुस्त है, वहां के नेताओं के पास सीधे फोन जा रहे हैं और उन्हें चेतावनी दी जा रही है कि चेहरा चमकाने से बेहतर है कि वे जमीन पर पसीना बहाएं।
विधायी आदेशों की आड़ में छिपी संगठन की बड़ी तैयारी
हैरानी की बात यह है कि विधानसभा और विधान परिषद की ओर से जारी आधिकारिक आदेशों ने इस सस्पेंस को और गहरा दिया है। सदन की तमाम महत्वपूर्ण कमेटियों के दौरे और बैठकें अचानक रद्द कर दी गई हैं। हालांकि सरकारी दस्तावेजों में इसका कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है, लेकिन हकीकत यह है कि हर विधायक और एमएलसी को अपनी-अपनी सीटों पर घेराबंदी करने के सख्त निर्देश मिले हैं। पार्टी का सारा जोर उन क्षेत्रों पर है जहां नए मतदाताओं की संख्या कम है। विधान परिषद के सदस्यों को विशेष रूप से उन मोर्चों पर तैनात किया गया है, जहां संगठन की पकड़ ढीली नजर आ रही है।
छह फरवरी की समय सीमा और 36 लाख का जादुई आंकड़ा
पार्टी के भीतर इस समय केवल एक ही मंत्र गूँज रहा है और वह है छह फरवरी की समय सीमा। बीते कुछ ही दिनों में इस सस्पेंस भरी रणनीति का असर जमीन पर भी दिखने लगा है। अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि इस खामोश सक्रियता के कारण राज्य में अब तक 36 लाख से अधिक नए वोटर बनाए जा चुके हैं। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पल-पल की रिपोर्ट ली जा रही है और आलाकमान यह सुनिश्चित कर रहा है कि कोई भी कार्यकर्ता अपनी पोस्ट छोड़कर लखनऊ न आए। यह केवल एक अभियान नहीं, बल्कि भाजपा की उस माइक्रो-मैनेजमेंट रणनीति का हिस्सा है, जो आने वाले समय में विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
---समाप्त---