भारत के हाईवे और एक्सप्रेस-वे पर सफर करते समय हर यात्री एक सेवा के बदले टोल टैक्स का भुगतान करता है। इस भुगतान के बदले उसे अच्छी सड़क और सुरक्षा की उम्मीद होती है, लेकिन पीलीभीत के टिकरी टोल प्लाजा पर जो हुआ, उसने इस सामाजिक अनुबंध की धज्जियां उड़ा दी हैं। जब आधे दर्जन से अधिक कर्मी एक निहत्थे चालक को कार से खींचकर उसकी पिटाई करते हैं, तो यह केवल एक मारपीट की घटना नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर तमाचा है जो दावा करती है कि देश में कानून का राज है। जानकारों का कहना है कि सरकार सड़कों का निर्माण और टोल वसूली का काम निजी कंपनियों को सौंप देती है, लेकिन उनके द्वारा तैनात कर्मचारियों के व्यवहार और नैतिक आचरण पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं रह जाता।
सुरक्षा के नाम पर तैनात 'निजी बाउंसर'
टोल प्लाजा पर तैनात कर्मचारी अक्सर किसी पेशेवर कंपनी के प्रतिनिधि के बजाय किसी गिरोह के सदस्यों की तरह व्यवहार करते नजर आते हैं। पीलीभीत की घटना इसका सबसे ताजा और क्रूर उदाहरण है। यहाँ सवाल यह उठता है कि क्या इन कर्मचारियों का कोई चरित्र सत्यापन (पुलिस वेरिफिकेशन) किया जाता है? बीबीसी की पूर्व की रिपोर्टों और विशेषज्ञों के अनुसार, कई बार स्थानीय दबंगों या ठेकेदारों के करीबी लोगों को ही इन टोल पर तैनात कर दिया जाता है, ताकि वे किसी भी विवाद को बातचीत के बजाय 'ताकत' के बल पर दबा सकें। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र में एक खतरनाक मिसाल पेश कर रही है, जहाँ वर्दी पहनी निजी सुरक्षा या कर्मचारी खुद को पुलिस से ऊपर समझने लगते हैं।
कानून की ढिलाई और बढ़ता दुस्साहस
ऐसी घटनाओं के बार-बार होने के पीछे सबसे बड़ी वजह कानून का लचीलापन है। अक्सर ऐसे मामलों में पुलिस 'कहासुनी' या 'आपसी विवाद' बताकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश करती है। जब तक किसी टोल प्लाजा का लाइसेंस रद्द करने या कंपनी पर भारी जुर्माना लगाने जैसे कड़े कदम नहीं उठाए जाते, तब तक इन कर्मियों का दुस्साहस कम नहीं होगा। टिकरी टोल पर हुई इस मारपीट ने राहगीरों के मन में यह सवाल पैदा कर दिया है कि अगर टोल पर उनके साथ कोई अनहोनी होती है, तो वे मदद के लिए किसके पास जाएंगे? जब सुरक्षा देने वाले ही हमलावर बन जाएं, तो आम नागरिक का तंत्र से भरोसा उठना स्वाभाविक है।
टोल टैक्स या लाइसेंस प्राप्त 'गुंडा टैक्स'?
इस पूरी घटना ने एक बुनियादी सवाल को जन्म दे दिया है कि क्या अब टोल टैक्स का स्वरूप बदलकर 'गुंडा टैक्स' जैसा होता जा रहा है? लोकतांत्रिक व्यवस्था में टैक्स के बदले सुरक्षा और सम्मान की गारंटी होती है, लेकिन टिकरी टोल पर जो हुआ वह किसी संगठित वसूली गिरोह की कार्यशैली से कम नहीं था। जब सड़क पर चलने का वैधानिक शुल्क वसूलने वाले कर्मी कानून को ठेंगे पर रखकर मुसाफिरों के साथ बर्बरता करें, तो उसे 'टैक्स' की संज्ञा देना भी एक विडंबना लगती है। स्थानीय लोग और बुद्धिजीवी अब यह पूछने पर मजबूर हैं कि क्या निजी ठेकेदारों को केवल वसूली का ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों को शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने का भी अघोषित लाइसेंस मिल गया है? यदि एक नागरिक की सुरक्षा और सम्मान को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता, तो टोल के नाम पर ली जाने वाली यह मोटी रकम आखिर किस हक से वसूली जा रही है? यह स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि जहाँ जवाबदेही खत्म होती है, वहीं से गुंडागर्दी का जन्म होता है।
क्या अब सरकार को सख्त कदम उठाने होंगे?
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के नियमों के अनुसार, टोल कर्मियों का व्यवहार यात्रियों के प्रति विनम्र और सहायक होना चाहिए। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि विनम्रता की जगह अब लात-घूंसों ने ले ली है। पीलीभीत की इस घटना ने सरकार और स्थानीय प्रशासन को एक कड़ा संदेश दिया है कि केवल फास्टैग (FASTag) और आधुनिक तकनीक से सड़कें सुरक्षित नहीं होंगी। असली सुरक्षा तब आएगी जब टोल संचालकों को यह एहसास होगा कि कानून हाथ में लेने पर उनका व्यापारिक अनुबंध खत्म हो सकता है। फिलहाल, जनता के मन में यह कड़वा सवाल बना हुआ है कि क्या उन्होंने टैक्स इसलिए दिया था ताकि उन्हें बीच सड़क पर अपमानित और प्रताड़ित होना पड़े?
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