रामपुर के पॉश इलाके गांधी समाधि रोड पर बीते दिनों जो हुआ, उसने न केवल मानवता को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि प्रशासन की संवेदनहीनता पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। आवास विकास परिषद मुरादाबाद की टीम ने पुलिस बल के साथ मिलकर जिन तीन मकानों को जमींदोज किया, उनके मलबे के बीच अब मासूम बच्चे और बुजुर्ग अपना भविष्य तलाश रहे हैं। इस कार्रवाई के विरोध में और सिर छिपाने के लिए छत की मांग को लेकर मंगलवार की शाम प्रभावित परिवारों का गुस्सा सड़क पर फूट पड़ा। महिलाओं और पुरुषों ने सिविल लाइंस क्षेत्र की मुख्य सड़क को पूरी तरह जाम कर दिया, जिससे यातायात व्यवस्था ठप हो गई। प्रदर्शनकारियों का साफ कहना था कि इस भीषण शीतलहर के बीच उन्हें बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के बेघर कर दिया गया है, जो सरासर नाइंसाफी है।

मात्र दस मिनट में खुला जाम लेकिन अनसुलझे रह गए बेबसी के सवाल

सड़क पर बढ़ते हंगामे और जाम की सूचना मिलते ही सिविल लाइंस इंस्पेक्टर संजीव कुमार भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे। शाम करीब साढ़े पांच बजे शुरू हुए इस प्रदर्शन को पुलिस ने अपनी सूझबूझ और सख्ती के मेल से मात्र दस मिनट के भीतर ही समाप्त करवा दिया। हालांकि सड़क तो खुल गई और गाड़ियां फिर से दौड़ने लगीं, लेकिन उन परिवारों के सवालों का जवाब अब भी नदारद है जो कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे रात काटने को मजबूर हैं। प्रदर्शनकारियों ने रोते हुए अपनी आपबीती सुनाई और बताया कि सुबह जब आवास विकास परिषद के लोग आए थे, तो उन्होंने अवैधता का हवाला देते हुए उनके घरों को खंडहर में तब्दील कर दिया। अब स्थिति यह है कि उनके पास रात गुजारने के लिए कोई सुरक्षित स्थान नहीं है।

प्रशासनिक दावों और प्रभावितों के आरोपों के बीच फंसी मानवीय संवेदनाएं

एक तरफ प्रशासन इस पूरी कार्रवाई को अतिक्रमण विरोधी अभियान बताकर अपनी पीठ थपथपा रहा है, वहीं दूसरी तरफ प्रभावित परिवारों के आरोप प्रशासन की मंशा पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। प्रदर्शनकारी महिलाओं का दावा है कि प्रशासन ने पूर्व में उनसे वादा किया था कि मकान हटाने से पहले उन्हें वैकल्पिक प्लॉट आवंटित किए जाएंगे, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट निकली। बिना किसी पूर्व सूचना या पुनर्वास की व्यवस्था किए बिना ही बुलडोजर चला दिया गया। उत्तराखंड तहलका ने भी इस मामले की गंभीरता को देखते हुए "आवास विकास की बेरहम कार्रवाई: सिर से छिनी छत, आशियाने के मलबे में भविष्य तलाश रहे मासूम" शीर्षक से इस दर्दनाक स्थिति को उजागर किया था। आज वही मासूम और बुजुर्ग कड़कड़ाती ठंड में ठिठुर रहे हैं और सत्ता के गलियारों में सन्नाटा पसरा हुआ है।

विकास की वेदी पर बलि चढ़ते गरीब और न्याय की धुंधली होती उम्मीद

गांधी समाधि जैसे महत्वपूर्ण मार्ग पर हुआ यह विरोध प्रदर्शन केवल एक जाम नहीं था, बल्कि उन दबे-कुचले लोगों की चीख थी जिनके सिर से उनकी छत छीन ली गई है। विकास के नाम पर किए जाने वाले सौंदर्यीकरण और अतिक्रमण हटाओ अभियानों के बीच अक्सर मानवीय दृष्टिकोण को हाशिए पर धकेल दिया जाता है। रामपुर की सड़कों पर उतरी इन महिलाओं की मांग केवल इतनी थी कि उन्हें इस जानलेवा ठंड से बचने के लिए कोई अस्थाई ठिकाना दे दिया जाए। पुलिस ने कानून व्यवस्था का हवाला देकर उन्हें सड़क से तो हटा दिया, लेकिन क्या उनके जीवन में आई इस कड़वी ठंड का समाधान किसी के पास है? सवाल यह भी है कि जब वादे वैकल्पिक भूखंड के किए गए थे, तो उन्हें पूरा किए बिना घरों को ढहाने की इतनी जल्दी क्यों थी।


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