रामपुर के गांधी समाधि रोड स्थित पॉश कॉलोनी में उस समय अफरा-तफरी मच गई जब आवास विकास परिषद का बुलडोजर भारी पुलिस बल के साथ वहां पहुंचा। अधिशासी अभियंता रजनीश कुशवाह के नेतृत्व में शुरू हुई इस कार्रवाई ने देखते ही देखते तीन परिवारों के सिर से छत छीन ली। कड़कड़ाती ठंड और शीतलहर के बीच हुई इस ध्वस्तीकरण की कार्रवाई ने न केवल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि स्थानीय लोगों के बीच भी भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। जिन घरों में चंद घंटों पहले जिंदगी मुस्कुरा रही थी, वहां अब सिर्फ ईंट-पत्थरों का ढेर और चीख-पुकार बची है।
प्रशासनिक तर्क और नोटिस का हवाला
आवास विकास परिषद के अधिशासी अभियंता का इस पूरे मामले पर स्पष्ट रुख है। उनका कहना है कि ये मकान पूरी तरह से आवास विकास की अधिग्रहित भूमि पर अवैध रूप से निर्मित किए गए थे। विभाग का दावा है कि इन मकानों को खाली करने के लिए पिछले चार महीनों से लगातार नोटिस दिए जा रहे थे। बार-बार चेतावनी के बावजूद जब मकान खाली नहीं किए गए, तब विभाग को यह कड़ा कदम उठाना पड़ा। प्रशासन इस कार्रवाई को नियमसंगत बता रहा है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या मानवीय संवेदनाओं को ताक पर रखकर की गई ऐसी कार्रवाई जायज है।
सड़क पर आए मासूम और बेबस परिवार
इस बुलडोजर एक्शन के कारण तीन परिवारों के लगभग बीस सदस्य एक झटके में बेघर हो गए हैं। इनमें छोटे बच्चे और महिलाएं भी शामिल हैं जो इस हाड़ कंपाने वाली ठंड में खुले आसमान के नीचे बैठने को मजबूर हैं। बेघर हुए लोग बदहवास होकर अपने गृहस्थी के सामान को मलबे से सुरक्षित निकालने की जद्दोजहद में लगे रहे। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि यह नजारा दिल दहला देने वाला था, जहां एक ओर सरकारी मशीनरी अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रही थी, वहीं दूसरी ओर बच्चे अपने खिलौने और किताबें मलबे में तलाश रहे थे।
वादाखिलाफी का गंभीर आरोप
मकान मालिकों और प्रभावितों का दर्द प्रशासन के दावों से बिल्कुल अलग है। पीड़ितों का आरोप है कि पूर्व में जब आवास विकास परिषद ने कॉलोनी निर्माण के लिए उनकी भूमि अधिग्रहित की थी, तब उन्हें पुनर्वास का भरोसा दिया गया था। प्रभावितों के अनुसार विभाग ने उन्हें साठ-साठ वर्ग मीटर के प्लॉट देने का वादा किया था, जो आज तक पूरा नहीं हुआ। उनका कहना है कि जब तक हमें वैकल्पिक जगह नहीं मिली, तब तक हमें हटाना सरासर अन्याय है। बिना उचित विस्थापन के की गई इस कार्रवाई ने प्रशासन के 'न्याय' के दावों की पोल खोलकर रख दी है।
शर्मसार होती संवेदनाएं
रामपुर की इस घटना ने एक बार फिर विकास और विनाश के बीच की बारीक लकीर को उजागर कर दिया है। एक ओर शहर को व्यवस्थित करने की योजनाएं हैं, तो दूसरी ओर उन इंसानों की सिसकियां हैं जिनका सब कुछ छिन गया है। स्थानीय बुद्धिजीवियों का मानना है कि अतिक्रमण हटाना कानून का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इतनी ठंड में बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के परिवारों को बेदखल करना मानवता को शर्मसार करने जैसा है। फिलहाल गांधी समाधि रोड पर मलबे के ढेर पर बैठे ये परिवार सरकार और सिस्टम से पूछ रहे हैं कि आखिर उनका कसूर क्या है।
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