प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल की दो दिवसीय यात्रा कूटनीतिक रूप से बेहद आक्रामक और स्पष्ट रही। इजराइल की संसद 'कनेसेट' को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने साफ तौर पर कहा कि भारत इजराइल के साथ मजबूती और पूरे विश्वास के साथ खड़ा है। यह समर्थन 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा किए गए आतंकी हमले के संदर्भ में था, जिसमें 1,200 निर्दोष लोगों की जान गई थी। पीएम मोदी के इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत अब रक्षा और आतंकवाद के मुद्दे पर इजराइल का एक बिना शर्त सहयोगी बन चुका है। यात्रा के दौरान विभिन्न मंत्रालयों के बीच 17 महत्वपूर्ण समझौते और 10 बड़ी घोषणाएं की गईं, जिसने दोनों देशों के रिश्तों को एक नई ऊंचाई पर पहुँचा दिया है।
ईरान की कूटनीतिक अपील और भारत की चुप्पी के मायने
पीएम मोदी की इस यात्रा से ठीक पहले ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने भारत से एक भावुक अपील की थी। अराग़ची ने भारत-ईरान के ऐतिहासिक और मजबूत रिश्तों का हवाला देते हुए नई दिल्ली को अपना सच्चा दोस्त बताया था और पीएम मोदी से अनुरोध किया था कि वे अपनी यात्रा के दौरान फिलिस्तीनियों के अधिकारों की बात उठाएं। हालांकि, पूरी यात्रा के दौरान भारतीय पक्ष की ओर से फिलिस्तीन मुद्दे पर कोई आधिकारिक चर्चा नहीं हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह चुप्पी ईरान के लिए एक बड़ा झटका थी, जिसने तेहरान को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि भारत अब खाड़ी की राजनीति में अपना पलड़ा पूरी तरह इजराइल की ओर झुका चुका है।
मोदी के लौटते ही युद्ध की शुरुआत और ईरान का छह देशों पर हमला
जैसे ही प्रधानमंत्री मोदी का विमान भारत की धरती पर उतरा, मध्य पूर्व में भीषण जंग का ऐलान हो गया। अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के तहत हमले शुरू कर दिए। जवाब में ईरान ने 'ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 4' लॉन्च करते हुए न केवल इजराइल, बल्कि सऊदी अरब, बहरीन, कतर, यूएई और कुवैत पर मिसाइलें दाग दीं। ईरान की इस जवाबी कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र को एक महायुद्ध में धकेल दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन हमलों की टाइमिंग महज एक इत्तेफाक नहीं है, बल्कि यह एक सोची-समझी सैन्य रणनीति का हिस्सा है जिसने भारत को एक बेहद मुश्किल कूटनीतिक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।
भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और रेस्क्यू का बड़ा संकट
युद्ध शुरू होते ही इजराइल और ईरान में रहने वाले लाखों भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। इजराइल में हजारों भारतीय श्रमिक और छात्र मौजूद हैं, जबकि ईरान में भी बड़ी संख्या में भारतीय कारोबारी और पेशेवर रहते हैं। खाड़ी के छह देशों पर एक साथ हुए हमलों और विमानन सेवाओं के ठप होने के कारण इन नागरिकों को सुरक्षित वापस लाना भारत सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। युद्ध क्षेत्र में फँसे अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालना अब विदेश मंत्रालय की सर्वोच्च प्राथमिकता बन गई है, लेकिन चारों तरफ से बंद समुद्री और हवाई रास्तों ने रेस्क्यू ऑपरेशनों पर संकट के बादल मंडरा दिए हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर युद्ध के विनाशकारी प्रभाव
अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच छिड़ी इस जंग का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है। खाड़ी क्षेत्र भारत के लिए ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है। सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों के तेल केंद्रों पर हमलों से कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आने की आशंका है। यदि 'स्ट्रेच ऑफ होर्मुज' बंद होता है, तो भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू सकती हैं, जिससे महंगाई बेकाबू हो जाएगी। इसके अलावा, ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह और अन्य व्यापारिक परियोजनाओं पर भी इस युद्ध का काला साया पड़ गया है। भारत के लिए यह स्थिति 'इधर कुआँ, उधर खाई' जैसी है, जहाँ उसे अपने रणनीतिक हितों और आर्थिक स्थिरता के बीच संतुलन बनाना होगा।
अमेरिकी युद्धपोत की चाल और कूटनीतिक असमंजस की स्थिति
युद्ध के मैदान में अमेरिकी विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन का 1,400 किलोमीटर पीछे हटना एक गहरी रणनीतिक चाल की ओर इशारा करता है। यह पीछे हटना सुरक्षित दूरी से ईरान पर और भी घातक हमले करने की तैयारी हो सकती है। भारत के लिए असमंजस यह है कि वह एक तरफ इजराइल के साथ अपने नए समझौतों को निभाए या फिर अपने पुराने मित्र ईरान के साथ संबंधों को टूटने से बचाए। विशेषज्ञों के अनुसार, पीएम मोदी की यात्रा के तुरंत बाद हुए इन हमलों ने भारत को वैश्विक मंच पर एक ऐसी स्थिति में डाल दिया है जहाँ उसे जल्द ही किसी एक पक्ष की ओर झुकाव दिखाने या फिर एक बहुत ही कठिन तटस्थता बनाए रखने का फैसला करना होगा।
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