निजी क्षेत्र की प्रमुख तेल कंपनी नायरा एनर्जी ने अपनी दरों में अचानक भारी इजाफा करते हुए पेट्रोल ₹5 और डीजल ₹3 प्रति लीटर महंगा कर दिया है। कंपनी का कहना है कि दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, जिससे लागत निकालना मुश्किल हो रहा था। भले ही नायरा के देश भर में 7,100 से ज्यादा पेट्रोल पंप हैं, मगर भारत के 90 फीसदी से ज्यादा बाजार पर आज भी इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सरकारी कंपनियों का दबदबा है। ऐसे में आज की तारीख में तो ज्यादातर लोगों की जेब पर तुरंत कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन इस एक कदम ने पूरे देश के बाजार में खलबली जरूर मचा दी है। लोगों के मन में अब बस यही एक सवाल गूंज रहा है कि क्या बाकी सरकारी कंपनियां भी इसी राह पर चलकर आम जनता को झटका देने वाली हैं।
सरकारी कंपनियों पर भारी दबाव
रेटिंग एजेंसी इक्रा के आंकड़े बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होने के बावजूद सरकारी कंपनियां लंबे समय से अपने दाम नहीं बढ़ा रही हैं। इसका नतीजा यह है कि सरकारी कंपनियों को हर लीटर पेट्रोल और डीजल बेचने पर करीब 8 से 9 रुपये का घाटा सहना पड़ रहा है। उधर जियो-बीपी जैसी दूसरी निजी कंपनियों ने अभी कीमतें बढ़ाने से परहेज किया है, पर घाटा ज्यादा दिन तक कोई नहीं झेल सकता। अगर वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की तेजी लंबे समय तक बनी रही, तो सरकारी कंपनियों के सामने दो ही रास्ते बचेंगे—या तो वे सीधे दाम बढ़ाकर जनता पर बोझ डालें, या फिर केंद्र और राज्य सरकारें पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले टैक्स में बड़ी कटौती करके स्थिति को संभालें।
आम आदमी की रसोई तक पहुंचेगी मार
डीजल सिर्फ गाड़ियों का ईंधन नहीं, बल्कि देश के पूरे ट्रांसपोर्ट और किसानी की रीढ़ है। जब भी डीजल की कीमत चढ़ती है, उसका सीधा असर हमारे रोजमर्रा के खर्चों पर दिखने लगता है। ट्रकों का भाड़ा बढ़ते ही मंडियों से आने वाली हरी सब्जियां, फल, दूध और राशन की चीजें तुरंत महंगी हो जाती हैं। यही नहीं, खेतों में चलने वाले ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और सिंचाई के पंप भी डीजल से चलते हैं, जिससे किसानों की फसल तैयार करने की लागत बढ़ जाएगी। दूसरी तरफ ऑटो-रिक्शा, टैक्सी, बस संचालक और ऑनलाइन डिलीवरी करने वाली कंपनियां भी अपना किराया 5 से 10 फीसदी तक बढ़ाने में देर नहीं करेंगी। साबुन, तेल और बिस्कुट बनाने वाली कंपनियां भी ढुलाई महंगी होते ही या तो दाम बढ़ा देती हैं या पैकेट का वजन कम कर देती हैं।
बजट संभालने की जरूरत
फिलहाल राहत की बात बस यही है कि जब तक सरकारी कंपनियां अपने रेट नहीं बदलतीं, तब तक आम जनता को घबराने की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर खाड़ी देशों में तनाव या कच्चे तेल की सप्लाई में कोई नई रुकावट आई, तो आने वाले दिनों में हर परिवार को अपने मासिक खर्च में 10 से 15 फीसदी तक की अतिरिक्त व्यवस्था रखनी होगी। एक चीज के महंगे होते ही दूसरी चीजें खुद-ब-खुद महंगी होने लगती हैं, इसलिए आने वाले समय के लिए हर घर को अपने घरेलू बजट को लेकर थोड़ा सतर्क रहना होगा।
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