राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर गांधी जयंती के दिन उस समय भारी अफरा-तफरी मच गई, जब विपक्षी दलों और छात्र संगठनों के हजारों कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए। यह पूरा विरोध प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई और मतदाता सूची से जुड़े गंभीर विवाद को लेकर बुलाया गया था। इस आंदोलन में विपक्षी दलों के गठबंधन के साथ-साथ आइसा, एसएफआई, एनएसयूआई, यूथ कांग्रेस और कॉकरोच जनता पार्टी जैसे छात्र व युवा संगठनों के कार्यकर्ता बड़ी तादाद में शामिल रहे। प्रदर्शनकारियों का साफ आरोप था कि चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर धांधली हुई है और इसके जरिए असली मतदाताओं के नाम सूची से गायब कर दिए गए हैं। वे चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया में आम जनता की सीधी भागीदारी और तुरंत ठोस सुधार की मांग कर रहे थे। पुलिस ने नई दिल्ली जिले में सुरक्षा कारणों से धारा 163 लागू कर रखी थी और धरने की कोई मंजूरी नहीं दी थी, फिर भी दोपहर होते-होते हजारों की भीड़ बैरिकेड्स के पास जमा हो गई।

​बड़े नेता हिरासत में

​जैसे ही भीड़ ने संसद मार्ग की तरफ बढ़ने की कोशिश की और बैरिकेड्स को पार करना चाहा, मौके पर तैनात दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों ने मोर्चा संभाल लिया। धक्का-मुक्की और तीखी नोकझोंक के बीच पुलिस ने करीब 700 से अधिक लोगों को हिरासत में लेकर बसों में भरना शुरू कर दिया। हिरासत में लिए गए प्रमुख चेहरों में दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी, दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज, राज्यसभा सांसद संजय सिंह, राजद सांसद मनोज झा और योगेंद्र यादव शामिल रहे। सांसद संजय सिंह को नॉर्थ एवेन्यू के पास रोका गया था, जिसके बाद वे सड़क पर ही धरने पर बैठ गए, लेकिन कुछ देर बाद पुलिस उन्हें भी जबरन गाड़ी में बैठाकर ले गई। छात्र संगठन आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा को भी पुलिसकर्मियों ने जंतर-मंतर से हिरासत में लिया। इस बीच सोशल मीडिया पर अरविंद केजरीवाल को पकड़े जाने की उड़ी अफवाहों का पार्टी नेताओं और पुलिस ने तुरंत खंडन किया।

​पत्रकार और इंफ्लुएंसर्स भी डिटेन

​हंगामे के दौरान पुलिस की सख्ती सिर्फ सियासी नेताओं और कार्यकर्ताओं तक ही सीमित नहीं रही। मौके पर कवरेज कर रहे कुछ स्वतंत्र पत्रकारों, वीडियो पत्रकारों और ग्राउंड से लाइव रिपोर्टिंग कर रहे सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स को भी पुलिस ने कार्रवाई की जद में ले लिया। आरोप है कि मोबाइल और कैमरों से लाइव फुटेज रिकॉर्ड कर रहे कई मीडियाकर्मियों के उपकरण छीनने की कोशिश हुई और उन्हें भी धक्का देकर पुलिस की गाड़ियों में बैठा दिया गया। इस कार्रवाई को लेकर पत्रकारों और डिजिटल क्रिएटर्स ने भारी नाराजगी जताई और इसे आवाज दबाने की कोशिश करार दिया। पुलिस अधिकारियों का तर्क था कि बिना अनुमति जुटी अनियंत्रित भीड़ को हटाने के दौरान अफरा-तफरी का माहौल बन गया था, जिसके चलते शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए मौके पर मौजूद सभी लोगों को वहां से हटाना जरूरी हो गया था।

​लुटियन दिल्ली में जाम

​इस भारी हंगामे का असर पूरी दिल्ली की कानून व्यवस्था और आम लोगों के आवागमन पर साफ दिखाई दिया। सुरक्षा के लिहाज से दिल्ली मेट्रो ने जनपथ, पटेल चौक, राजीव चौक समेत लुटियन और मध्य दिल्ली के करीब 11 प्रमुख स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार बंद कर दिए। इसके साथ ही जंतर-मंतर के आसपास डेढ़ किलोमीटर के दायरे में मोबाइल इंटरनेट की रफ्तार धीमी कर दी गई, ताकि किसी भी तरह की अफवाह न फैले। कनाट प्लेस, टॉल्स्टॉय मार्ग और संसद मार्ग पर गाड़ियां रेंगती रहीं और शाम के समय दफ्तर से घर लौट रहे लोगों को भारी जाम से जूझना पड़ा। दूसरी तरफ इस विवाद की गूंज मुंबई के शिवाजी पार्क तक भी पहुंची, जहां अनुमति न मिलने के बाद जेल भरो आंदोलन की शुरुआत की गई। बढ़ते दबाव को देखते हुए चुनाव आयोग ने 20 राज्यों में छूटे हुए वोटरों के नाम फॉर्म-6 के जरिए दोबारा जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाने के निर्देश दिए हैं, ताकि स्थिति को संभाला जा सके।


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