दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में आज एक ऐतिहासिक और चिंताजनक मोड़ आया है जब पाकिस्तान ने अपने पड़ोसी देश अफगानिस्तान के खिलाफ औपचारिक रूप से सैन्य अभियान की शुरुआत कर दी। लंबे समय से सीमा पर जारी छिटपुट झड़पों और कूटनीतिक तल्खी ने अब एक पूर्ण युद्ध का रूप ले लिया है। पाकिस्तानी रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि उनकी सेना अब केवल रक्षात्मक मुद्रा में नहीं रहेगी। ऑपरेशन गजब-लिल-हक के माध्यम से पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के भीतर घुसकर उन ठिकानों को निशाना बनाने की रणनीति अपनाई है जिन्हें वह अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता है। हवाई हमलों की तीव्रता इतनी अधिक थी कि काबुल और कंधार जैसे प्रमुख शहर धमाकों की गूंज से थर्रा उठे। पाकिस्तान का तर्क है कि बार-बार की चेतावनियों के बावजूद जब आतंकी गतिविधियों पर लगाम नहीं लगी, तब उनके पास बल प्रयोग के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं बचा था।

​हवाई हमलों के बाद सीमा पर जमीनी संघर्ष

​पाकिस्तान द्वारा किए गए हवाई हमलों ने अफगानिस्तान के कई प्रांतों में भारी तबाही मचाई है। पाकिस्तानी सैन्य सूत्रों के अनुसार इन हमलों का मुख्य उद्देश्य तालिबान के सैन्य ढांचे को ध्वस्त करना था। काबुल, कंधार और पक्तिया जैसे सामरिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में की गई इस बमबारी में सैकड़ों की संख्या में लड़ाकों के मारे जाने की खबरें आ रही हैं। हालांकि यह संघर्ष केवल आसमान तक सीमित नहीं रहा है। जमीनी स्तर पर भी दोनों देशों की सेनाओं के बीच आमने-सामने की लड़ाई शुरू हो गई है। तालिबान ने भी पाकिस्तान के इन हमलों पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए सीमावर्ती चौकियों पर धावा बोल दिया है। इस जवाबी कार्रवाई में कई पाकिस्तानी सैनिकों के हताहत होने और कुछ सैन्य ठिकानों पर तालिबान के नियंत्रण की सूचनाएं मिल रही हैं, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि स्थिति अब नियंत्रण से बाहर हो चुकी है।

​डूरंड रेखा का विवाद और टीटीपी का बढ़ता साया

​इस पूरे संघर्ष की जड़ें डूरंड रेखा के पुराने विवाद और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान की सक्रियता में छिपी हुई हैं। पाकिस्तान लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि अफगान तालिबान टीटीपी के लड़ाकों को पनाह दे रहा है, जो पाकिस्तानी सीमा के भीतर घुसकर लगातार हमले कर रहे हैं। इस्लामाबाद का मानना है कि जब तक अफगानिस्तान की धरती पर मौजूद इन सुरक्षित पनाहगाहों को नष्ट नहीं किया जाता, तब तक पाकिस्तान में शांति संभव नहीं है। दूसरी ओर तालिबान प्रशासन डूरंड रेखा को आधिकारिक सीमा मानने से इनकार करता रहा है और पाकिस्तान के हवाई हमलों को अपनी संप्रभुता का खुला उल्लंघन मान रहा है। जबीहुल्लाह मुजाहिद के बयानों से यह साफ झलकता है कि अफगान सरकार इस बार किसी भी तरह के समझौते के मूड में नहीं है और वह इस सैन्य कार्रवाई का जवाब उसी की भाषा में देने की तैयारी कर चुकी है।

​वैश्विक मंच पर बढ़ती चिंता 

​जैसे-जैसे युद्ध की लपटें बढ़ रही हैं, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंताएं भी गहरी होती जा रही हैं। संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक शक्तियों ने इस सैन्य टकराव को तत्काल रोकने की अपील की है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो इसका असर केवल इन दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित करेगा। मानवीय आधार पर भी यह स्थिति भयावह हो सकती है क्योंकि सीमावर्ती इलाकों से आम नागरिकों का पलायन शुरू हो गया है। फिलहाल दोनों ओर से संवाद के रास्ते बंद नजर आ रहे हैं और बारूद की गंध के बीच कूटनीति कहीं खो गई है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि यह संघर्ष किसी शांति समझौते की ओर बढ़ता है या फिर यह एक विनाशकारी क्षेत्रीय युद्ध में तब्दील हो जाता है।


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