खंडपीठ और फैसला
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
1. मामले की पृष्ठभूमि
* दोषसिद्धि: आरोपी को ट्रायल कोर्ट ने POCSO एक्ट के तहत 10 साल की कठोर कैद और IPC की धारा 366 के तहत 5 साल की सज़ा सुनाई थी। मद्रास हाईकोर्ट ने सितंबर 2021 में इस सज़ा को बरकरार रखा था।
* शादी: हाईकोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान, आरोपी और पीड़िता ने मई 2021 में शादी कर ली थी।
* वर्तमान स्थिति: जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो कोर्ट ने तमिलनाडु राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (TNSLSA) को पीड़िता का हाल जानने का निर्देश दिया। TNSLSA की रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि कपल खुशी-खुशी शादीशुदा जीवन जी रहे हैं और उनका एक साल से कम उम्र का एक बेटा भी है।
2. कोर्ट के समक्ष दलीलें और साक्ष्य
* पत्नी का हलफनामा: पीड़िता (अब पत्नी) ने कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर स्पष्ट रूप से कहा कि वह अपने पति के साथ शांतिपूर्ण और स्थिर पारिवारिक जीवन जीना चाहती है और वह उस पर आश्रित है। उसने यह भी कहा कि वह नहीं चाहती कि उसके पति के माथे पर अपराधी होने का दाग लगे।
* शिकायतकर्ता की सहमति: पीड़िता के पिता, जो इस मामले में मूल शिकायतकर्ता थे, ने भी अदालत को सूचित किया कि उन्हें आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करने पर कोई आपत्ति नहीं है।
* आरोपी की दलील: आरोपी ने दलील दी कि आपराधिक कार्यवाही जारी रहने से उनके विवाह और पारिवारिक जीवन में बाधा आएगी, और बच्चे को नुकसान होगा।
3. सुप्रीम कोर्ट का निर्णायक विश्लेषण
पीठ ने POCSO अधिनियम की गंभीरता को समझते हुए भी, व्यक्तिगत मामले की "व्यावहारिक वास्तविकताओं" (Practical Realities) पर जोर दिया:
* "प्रेम का परिणाम, वासना नहीं": कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा, "POCSO एक्ट के तहत अपीलकर्ता द्वारा किए गए अपराध पर विचार करते हुए, हमने पाया है कि यह अपराध वासना का नहीं बल्कि प्रेम का नतीजा था।"
* न्याय के लिए कानून का झुकना: बेंच ने माना कि सामान्य कानून के तहत, गंभीर अपराध में समझौता (Compromise) सज़ा रद्द करने का आधार नहीं बन सकता। हालाँकि, पीठ इस निष्कर्ष पर पहुंची कि "यह एक ऐसा मामला है जहाँ कानून को न्याय के लिए झुकना चाहिए।"
* पारिवारिक इकाई की रक्षा: कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि आरोपी को जेल में रखना इस पारिवारिक इकाई को बाधित करेगा और पीड़िता, नवजात शिशु और स्वयं समाज के ताने-बाने को अपूरणीय क्षति पहुंचाएगा।
4. अंतिम निर्णय और सख्त शर्तें
'संपूर्ण न्याय' (Complete Justice) सुनिश्चित करने के लिए अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि और सज़ा को रद्द कर दिया। लेकिन, कोर्ट ने व्यक्ति पर सख्त शर्तें लगाईं:
* भरण-पोषण की बाध्यता: अपीलकर्ता जीवन भर अपनी पत्नी और बच्चे का सम्मानपूर्वक भरण-पोषण करेगा और उन्हें कभी नहीं छोड़ेगा।
* चेतावनी: कोर्ट ने कड़े शब्दों में चेतावनी दी कि भविष्य में यदि पति की ओर से कोई चूक होती है और पत्नी या बच्चे द्वारा यह बात अदालत के ध्यान में लाई जाती है, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे, जो अपीलकर्ता के लिए "सहज नहीं होंगे।"
यह फैसला किशोरों के बीच सहमति से बने यौन संबंधों को अपराध मानने वाले POCSO अधिनियम के कठोर प्रावधानों पर कानूनी और सामाजिक बहस को फिर से तेज करता है। ---समाप्त---POCSO मामला: सुप्रीम कोर्ट ने 'प्रेम' और 'वासना' के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए सज़ा की रद्द की
Nov 02, 2025
Harvinder Sidhu | उत्तराखण्ड तहलका,
Harvinder Sidhu | उत्तराखण्ड तहलका,
खंडपीठ और फैसला
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
1. मामले की पृष्ठभूमि
* दोषसिद्धि: आरोपी को ट्रायल कोर्ट ने POCSO एक्ट के तहत 10 साल की कठोर कैद और IPC की धारा 366 के तहत 5 साल की सज़ा सुनाई थी। मद्रास हाईकोर्ट ने सितंबर 2021 में इस सज़ा को बरकरार रखा था।
* शादी: हाईकोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान, आरोपी और पीड़िता ने मई 2021 में शादी कर ली थी।
* वर्तमान स्थिति: जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो कोर्ट ने तमिलनाडु राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (TNSLSA) को पीड़िता का हाल जानने का निर्देश दिया। TNSLSA की रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि कपल खुशी-खुशी शादीशुदा जीवन जी रहे हैं और उनका एक साल से कम उम्र का एक बेटा भी है।
2. कोर्ट के समक्ष दलीलें और साक्ष्य
* पत्नी का हलफनामा: पीड़िता (अब पत्नी) ने कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर स्पष्ट रूप से कहा कि वह अपने पति के साथ शांतिपूर्ण और स्थिर पारिवारिक जीवन जीना चाहती है और वह उस पर आश्रित है। उसने यह भी कहा कि वह नहीं चाहती कि उसके पति के माथे पर अपराधी होने का दाग लगे।
* शिकायतकर्ता की सहमति: पीड़िता के पिता, जो इस मामले में मूल शिकायतकर्ता थे, ने भी अदालत को सूचित किया कि उन्हें आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करने पर कोई आपत्ति नहीं है।
* आरोपी की दलील: आरोपी ने दलील दी कि आपराधिक कार्यवाही जारी रहने से उनके विवाह और पारिवारिक जीवन में बाधा आएगी, और बच्चे को नुकसान होगा।
3. सुप्रीम कोर्ट का निर्णायक विश्लेषण
पीठ ने POCSO अधिनियम की गंभीरता को समझते हुए भी, व्यक्तिगत मामले की "व्यावहारिक वास्तविकताओं" (Practical Realities) पर जोर दिया:
* "प्रेम का परिणाम, वासना नहीं": कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा, "POCSO एक्ट के तहत अपीलकर्ता द्वारा किए गए अपराध पर विचार करते हुए, हमने पाया है कि यह अपराध वासना का नहीं बल्कि प्रेम का नतीजा था।"
* न्याय के लिए कानून का झुकना: बेंच ने माना कि सामान्य कानून के तहत, गंभीर अपराध में समझौता (Compromise) सज़ा रद्द करने का आधार नहीं बन सकता। हालाँकि, पीठ इस निष्कर्ष पर पहुंची कि "यह एक ऐसा मामला है जहाँ कानून को न्याय के लिए झुकना चाहिए।"
* पारिवारिक इकाई की रक्षा: कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि आरोपी को जेल में रखना इस पारिवारिक इकाई को बाधित करेगा और पीड़िता, नवजात शिशु और स्वयं समाज के ताने-बाने को अपूरणीय क्षति पहुंचाएगा।
4. अंतिम निर्णय और सख्त शर्तें
'संपूर्ण न्याय' (Complete Justice) सुनिश्चित करने के लिए अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि और सज़ा को रद्द कर दिया। लेकिन, कोर्ट ने व्यक्ति पर सख्त शर्तें लगाईं:
* भरण-पोषण की बाध्यता: अपीलकर्ता जीवन भर अपनी पत्नी और बच्चे का सम्मानपूर्वक भरण-पोषण करेगा और उन्हें कभी नहीं छोड़ेगा।
* चेतावनी: कोर्ट ने कड़े शब्दों में चेतावनी दी कि भविष्य में यदि पति की ओर से कोई चूक होती है और पत्नी या बच्चे द्वारा यह बात अदालत के ध्यान में लाई जाती है, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे, जो अपीलकर्ता के लिए "सहज नहीं होंगे।"
यह फैसला किशोरों के बीच सहमति से बने यौन संबंधों को अपराध मानने वाले POCSO अधिनियम के कठोर प्रावधानों पर कानूनी और सामाजिक बहस को फिर से तेज करता है। ---समाप्त---