उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले से एक ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है जिसने न केवल प्रशासनिक दावों की पोल खोल दी है बल्कि जनसुनवाई तंत्र पर भी गहरा आघात किया है। गोवर्धन थाना क्षेत्र के एक साधारण किसान परिवार के बेटे ने जब साहस जुटाकर मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल पर सब-इंस्पेक्टर कपिल नागर के खिलाफ बीस हजार रुपये की रिश्वत मांगने की शिकायत दर्ज कराई, तो उसे अंदाजा भी नहीं था कि व्यवस्था में सुधार की उसकी यह कोशिश उसके जीवन का सबसे भयावह सपना बन जाएगी। जनसुनवाई पोर्टल जिसे जनता की समस्याओं के त्वरित समाधान के लिए बनाया गया था, वह इस युवक के लिए काल कोठरी का रास्ता बन गया। पुलिस ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करते हुए शिकायतकर्ता को ही अपराधी की तरह थाने बुलाया और फिर शुरू हुआ हैवानियत का वो नंगा नाच जिसे सुनकर किसी भी सभ्य समाज की रूह कांप जाए।
थानों के भीतर मानवता का कत्ल और बर्बरता
गोवर्धन थाने के भीतर जो कुछ भी हुआ वह खाकी वर्दी पर कभी न मिटने वाला एक बदनुमा दाग है। आरोपी दरोगा ने अपनी शिकायत से तिलमिलाकर युवक को एक बंद कमरे में ले जाकर बेरहमी से पीटना शुरू किया। मर्यादा की सारी सीमाएं लांघते हुए युवक के गुप्तांगों पर लगातार प्रहार किए गए, जिससे उसकी हालत अत्यंत नाजुक हो गई। यह केवल शारीरिक हिंसा नहीं थी, बल्कि एक नागरिक के सम्मान और उसकी अस्मिता को कुचलने का प्रयास था। जब पीड़ित के परिजन थाने के बाहर अपने बेटे की सलामती की भीख मांग रहे थे, तब अंदर वर्दीधारी अपनी क्रूरता की नुमाइश कर रहे थे। हद तो तब हो गई जब अधमरी हालत में युवक को निर्वस्त्र करके थाने के मुख्य द्वार के बाहर फेंक दिया गया। मानवता को शर्मसार करने वाली इस तस्वीर ने यह साबित कर दिया कि सत्ता और वर्दी के नशे में चूर कुछ अधिकारी खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं।
प्रशासनिक साख पर सवाल और जनता का आक्रोश
इस घटना ने सीधे तौर पर मुख्यमंत्री कार्यालय की मॉनिटरिंग और पुलिस की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। यदि पोर्टल पर की गई शिकायतों का निपटारा इसी प्रकार की हिंसा से होगा, तो भविष्य में कोई भी आम नागरिक भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा। पीड़ित को समय पर चिकित्सकीय सहायता न देना और उसे अपमानित करना यह दर्शाता है कि पुलिस अब 'मित्र' नहीं बल्कि 'भक्षक' की भूमिका में आ गई है। स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों में इस घटना को लेकर भारी रोष व्याप्त है और वे अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। यह मामला केवल एक सस्पेंशन या विभागीय जांच तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह एक उदाहरण बनना चाहिए कि जनता के संवैधानिक अधिकारों के साथ खिलवाड़ करने वालों का स्थान जेल की सलाखों के पीछे है। उत्तर प्रदेश सरकार के लिए अब यह परीक्षा की घड़ी है कि वह अपनी 'जीरो टॉलरेंस' नीति को धरातल पर कैसे लागू करती है।
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