लोकसभा के बजट सत्र में पिछले कई दिनों से जारी हंगामा अब एक बड़े संवैधानिक संकट की ओर बढ़ता दिख रहा है। सदन की कार्यवाही में लगातार हो रहे व्यवधान के बीच विपक्षी दलों ने एकजुट होकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास व्यक्त करते हुए उन्हें पद से हटाने का नोटिस दिया है। इस पूरे घटनाक्रम ने भारतीय संसदीय इतिहास में एक नई चर्चा को जन्म दे दिया है। सूत्रों के मुताबिक इस गंभीर स्थिति को देखते हुए अध्यक्ष ओम बिरला ने एक बड़ा और कड़ा निर्णय लिया है। बताया जा रहा है कि जब तक उनके खिलाफ दिए गए इस नोटिस पर कोई स्पष्ट फैसला या स्थिति साफ नहीं हो जाती तब तक उन्होंने सदन की कार्यवाही का हिस्सा न बनने और लोकसभा न जाने का मन बनाया है। उनका यह कदम इस बात का संकेत है कि वे इस मामले की पूरी शुचिता और गरिमा को बनाए रखना चाहते हैं।
महासचिव को जांच के आदेश और प्रक्रियात्मक कदम
नोटिस मिलने के तुरंत बाद लोकसभा अध्यक्ष ने प्रशासनिक और विधिक स्तर पर कार्यवाही शुरू कर दी है। उन्होंने लोकसभा के महासचिव उत्पल कुमार सिंह को इस मामले में हस्तक्षेप करने और विपक्षी दलों द्वारा सौंपे गए प्रस्ताव की बारीकी से जांच करने का निर्देश दिया है। स्पीकर ने स्पष्ट किया है कि महासचिव इस नोटिस के हर कानूनी और तकनीकी पहलू की जांच करें और उसके बाद ही कोई उचित कदम उठाएं। इस निर्देश के बाद अब महासचिव का कार्यालय इस बात की समीक्षा कर रहा है कि क्या यह नोटिस संसदीय नियमों और संवैधानिक मर्यादाओं के अनुकूल है। सदन के भीतर इस जांच के आदेश ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच की लकीर को और गहरा कर दिया है क्योंकि दोनों ही पक्ष अपने-अपने तर्कों पर अड़े हुए हैं।
विपक्ष की नाराजगी और एकजुटता के पीछे के कारण
विपक्षी खेमे ने इस कदम के पीछे कई गंभीर तर्क दिए हैं। कांग्रेस और अन्य सहयोगी दलों का आरोप है कि सदन का संचालन करते समय अध्यक्ष का झुकाव सत्ता पक्ष की ओर अधिक रहता है। विपक्षी सांसदों का कहना है कि सदन में उनकी आवाज को दबाने का प्रयास किया जा रहा है और विपक्ष के प्रमुख नेताओं पर लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं। विपक्ष ने अपनी शिकायत में यह भी दर्ज कराया है कि वे व्यक्तिगत तौर पर पद का सम्मान करते हैं लेकिन जिस तरह से सदन की लोकतांत्रिक परंपराओं का कथित तौर पर उल्लंघन हो रहा है उससे वे बेहद आहत हैं। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में विपक्ष की रणनीति में एक दिलचस्प मोड़ भी देखने को मिला है। जहां एक ओर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और द्रमुक जैसे दलों के 100 से ज्यादा सांसदों ने इस नोटिस पर अपने हस्ताक्षर किए हैं वहीं तृणमूल कांग्रेस ने फिलहाल इस प्रक्रिया से खुद को दूर रखा है। संविधान के अनुच्छेद 94 (सी) के तहत दिए गए इस नोटिस ने अब बजट सत्र की दिशा बदल दी है।
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