उधमसिंह नगर जनपद के खटीमा निवासी राजविंदर सिंह ने सोशल मीडिया पर भ्रामक वीडियो वायरल करने वाले युवकों के दावों की असलियत उजागर करते हुए स्पष्ट किया है कि उन पर लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह निराधार और मनगढ़ंत हैं। राजविंदर सिंह के अनुसार, खटीमा और बिलासपुर के इन चार युवकों को पूरी पारदर्शिता के साथ अलखलीज पोलिमर्स कंपनी की सेवा शर्तों, काम के स्वरूप और वेतन के बारे में पहले ही विस्तार से समझा दिया गया था। युवकों द्वारा एसएसपी मणिकांत मिश्रा को गुमराह करने के उद्देश्य से जो वीडियो बनाया गया है, वह असल में अपनी जिम्मेदारियों से भागने और कंपनी पर दबाव बनाने की एक सोची-समझी साजिश है। राजविंदर सिंह ने स्पष्ट किया कि रबर और प्लास्टिक के काम की जानकारी युवकों को पहले से थी, लेकिन अब काम से जी चुराने के लिए वे बीमारी और बंधक बनाए जाने जैसे झूठे बहाने बनाकर उनकी सामाजिक छवि को धूमिल करने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं।
अलखलीज पोलिमर्स की सेवा शर्तें और युवकों की रजामंदी
पूरे मामले की गहराई में जाएं तो यह स्पष्ट होता है कि राजविंदर सिंह और प्रकाश बोरा ने पारदर्शी तरीके से युवकों को दुबई भेजा था। राजविंदर ने खुलासा किया कि बड़ा भुड़िया के जुगेश, चंदेली के लल्लन प्रसाद और रामपुर के बिलासपुर निवासी विशाल व रंजीत को जाने से पहले ही बता दिया गया था कि उन्हें रेसल खेमा स्थित अलखलीज पोलिमर्स कंपनी में बतौर हेल्पर काम करना होगा। इसके लिए उन्हें आठ घंटे की ड्यूटी के बदले 1200 दिरहम यानी करीब तीस हजार रुपये वेतन, मुफ्त आवास और भोजन की सुविधा मिलनी तय हुई थी। यहां तक कि चेनई एयरपोर्ट पर भी कंपनी के एसोसिएट द्वारा भी इन्हें दो साल के कॉन्ट्रैक्ट और उसे समय से पहले तोड़ने पर लगने वाले 12500 दिरहम के जुर्माने की शर्तों से पूरी तरह अवगत कराया गया था। इन सभी शर्तों पर अपनी लिखित और मौखिक सहमति देने के बाद ही ये चारों युवक स्वेच्छा से युएई के लिए रवाना हुए थे।
लाखों खर्च कर कराई थी यात्रा फिर भी मिला आरोपों का घाव
राजविंदर सिंह ने इस विवाद में एक ऐसा भावुक और कानूनी पहलू रखा है जो युवकों के दावों को पूरी तरह खारिज करता है। उन्होंने बताया कि 13 दिसंबर 2025 को जब इन युवकों की रवानगी थी, तब ये अपनी लापरवाही के कारण समय पर एयरपोर्ट नहीं पहुंचे और इनकी फ्लाइट मिस हो गई। कानूनी और नैतिक रूप से एजेंट की कोई जिम्मेदारी न होने के बावजूद राजविंदर सिंह ने दरियादिली दिखाई और अपने निजी कोष से इन चारों के लिए दोबारा हवाई टिकट बुक कराए। इतना ही नहीं, होटल और ट्रेन के सफर के खर्च के लिए प्रति व्यक्ति पांच-पांच हजार रुपये की अलग से नगद सहायता भी प्रदान की। राजविंदर का तर्क है कि जो व्यक्ति किसी की मदद के लिए अपनी जेब से लाखों रुपये दोबारा खर्च कर सकता है, वह उनके साथ किसी भी तरह की धोखाधड़ी क्यों करेगा। यह सीधे तौर पर एहसान फरामोशी का मामला नजर आता है।
काम की चोरी और डिजिटल सबूतों के साथ जांच की चुनौती
राजविंदर सिंह के अनुसार विवाद का मुख्य कारण इन युवकों की काम न करने की नीयत है। डिजिटल रिकॉर्ड और कंपनी के आंकड़ों के मुताबिक इन चारों ने 31 दिसंबर तक कंपनी में सुचारू रूप से कार्य किया और उसके एवज में करीब ग्यारह हजार सात सौ रुपये का वेतन भी प्राप्त कर लिया। अब जब कंपनी इन्हें काम पर लौटने के लिए कह रही है, तो ये युवक सोशल मीडिया पर 'विक्टिम कार्ड' खेलकर खुद को पीड़ित साबित करने में जुट गए हैं। राजविंदर ने दावा किया है कि पूरा पैकेज अस्सी हजार रुपये में तय हुआ था जिसमें एयर टिकट भी शामिल था और पूरी प्रक्रिया में रत्ती भर भी अनियमियता नहीं थी। उन्होंने प्रशासन को स्पष्ट कर दिया है कि उनके पास हर ट्रांजेक्शन और बातचीत के पुख्ता प्रमाण मौजूद हैं और वह किसी भी स्तर की जांच में खुद को निर्दोष साबित करने का दम रखते हैं।
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