भारत में निवेश के नाम पर आम जनता को गुमराह करने और उनकी जीवन भर की कमाई को हड़पने वाले सफेदपोश ठगों के खिलाफ अब जन-आक्रोश सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक दिखाई देने लगा है। कैनविज के मालिक कन्हैया गुलाटी जैसे नाम आज उन हजारों लोगों के लिए दर्द का कारण बन चुके हैं, जिन्होंने बेहतर भविष्य के सपने देखते हुए अपनी जमापूंजी इन कंपनियों के हवाले कर दी थी। आज देश के कोने-कोने में ऐसे कितने ही 'सफेदपोश' गिद्ध बैठे हैं जो सीधे-साधे और भोले-भाले लोगों की मेहनत की कमाई और उनकी संपत्तियों पर नजरें गड़ाए हुए हैं। इन ठगों का काम करने का तरीका इतना शातिर होता है कि आम आदमी इनके बुने हुए सुनहरे सपनों के जाल में आसानी से फंस जाता है।
सुनहरे सपनों के पीछे छिपा कड़वा सच
इन कंपनियों के संचालक अक्सर खुद को बड़े समाजसेवी, प्रभावशाली व्यक्तित्व या सफल बिजनेसमैन के तौर पर पेश करते हैं। भारी-भरकम विज्ञापनों और लुभावने वादों के दम पर यह विश्वास पैदा किया जाता है कि यहाँ पैसा निवेश करना पूरी तरह सुरक्षित है। लेकिन हकीकत में यह एक ऐसा दलदल होता है जिसमें एक बार पैर रखने के बाद निवेशक अपनी मूल पूंजी तक वापस नहीं पा पाता। कन्हैया गुलाटी जैसे उदाहरण बताते हैं कि किस तरह लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर अरबों रुपये का साम्राज्य खड़ा किया जाता है। जब तक लोगों को ठगी का अहसास होता है, तब तक ये सफेदपोश ठग कानून की खामियों का फायदा उठाकर सुरक्षित निकल चुके होते हैं या अपनी संपत्तियों को इधर-उधर कर देते हैं।
संपत्ति की कुर्की और सख्त कानून की दरकार
अब समय आ गया है कि सरकार को इन आर्थिक अपराधियों के खिलाफ युद्ध स्तर पर कार्रवाई करने की आवश्यकता है। वर्तमान न्याय व्यवस्था में अदालती कार्यवाही लंबी खिंचती है, जिसका सीधा फायदा इन ठगों को मिलता है। जनता के बीच से यह मांग पुरजोर तरीके से उठ रही है कि यदि सरकार आतंकवाद या अन्य गंभीर अपराधों से अर्जित संपत्ति को कुर्क कर सकती है, तो इन ठगों को क्यों बख्शा जाना चाहिए? झूठे वादे करके लोगों को ठगना भी किसी जघन्य अपराध से कम नहीं है क्योंकि यह एक परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ देता है। ऐसे में कानून में संशोधन कर यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि इन अपराधियों की निजी और व्यावसायिक संपत्तियों को तत्काल प्रभाव से जब्त किया जाए।
पूंजी वापसी के लिए प्रभावी तंत्र की आवश्यकता
सिर्फ संपत्ति कुर्क करना ही काफी नहीं है, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण कदम उन पीड़ितों को न्याय दिलाना है जिन्होंने अपना सब कुछ गंवा दिया है। सरकार को एक ऐसी पारदर्शी प्रक्रिया बनानी चाहिए जिसमें कुर्क की गई संपत्तियों की जल्द से जल्द नीलामी हो और उससे मिलने वाली रकम को सीधे उन लोगों को लौटाया जाए जो ठगी का शिकार हुए हैं। जब तक ठगों के मन में यह डर नहीं होगा कि उनकी विलासिता का सामान और आलीशान कोठियां नीलाम कर दी जाएंगी, तब तक वे मासूम लोगों की गाढ़ी कमाई को लूटना बंद नहीं करेंगे। आर्थिक सुरक्षा आज के समय में देश की आंतरिक सुरक्षा जितनी ही महत्वपूर्ण है।
जागरूकता और सरकारी जवाबदेही
अंततः, यह लड़ाई केवल पीड़ितों की नहीं बल्कि पूरे समाज और सरकार की है। प्रशासन को चाहिए कि वह ऐसी संदिग्ध कंपनियों पर शुरू से ही कड़ी नजर रखे ताकि कन्हैया गुलाटी जैसे लोग फल-फूल न सकें। जनता को भी ऐसे निवेशों से बचना चाहिए जो रातों-रात अमीर बनाने का दावा करते हैं। सरकार को चाहिए कि वह जिला स्तर पर विशेष टास्क फोर्स का गठन करे जो केवल ऐसी ठगी की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई करे। जब तक सजा सख्त और रिकवरी तेज नहीं होगी, तब तक इन सफेदपोश गिद्धों का शिकार जारी रहेगा। अब कठोर नियम बनाना केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के हितों की रक्षा के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता बन गई है।
क्या आप इस खबर को किसी विशिष्ट सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए पोस्ट के रूप में ढालना चाहेंगे?


Advertisement
---समाप्त---