गाजियाबाद की विशेष एमपी-एमएलए अदालत द्वारा राकेश टिकैत समेत छत्तीस नेताओं पर आरोप तय किया जाना भारतीय राजनीति और विरोध-प्रदर्शनों के कानूनी परिणामों की एक लंबी याद दिलाता है। ग्यारह वर्ष पुराने इस मामले में न्यायपालिका की सक्रियता यह स्पष्ट करती है कि समय बीतने के साथ कानूनी प्रक्रियाएं धुंधली पड़ सकती हैं, लेकिन समाप्त नहीं होतीं। यह मामला केवल एक प्रदर्शन का कानूनी लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह उस दौर की राजनीतिक भावनाओं और सत्ता के प्रति असंतोष का प्रतीक भी है।
वर्ष दो हजार चौदह की वह घटना, जब चौधरी अजित सिंह के दिल्ली स्थित आवास को खाली कराने के विरोध में मुरादनगर की गंगनहर पर किसान और रालोद कार्यकर्ता एकजुट हुए थे, आज फिर चर्चा के केंद्र में है। उस समय हुए लाठीचार्ज और उपद्रव ने न केवल कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती पेश की थी, बल्कि यह किसान राजनीति के शक्ति प्रदर्शन का केंद्र भी बन गया था। अब जब अदालत ने इन सभी दिग्गजों पर ट्रायल चलाने का निर्णय लिया है, तो यह संदेश भी जाता है कि सार्वजनिक संपत्तियों और नागरिक अनुशासन से जुड़ी मर्यादाओं का उल्लंघन किसी भी सूरत में जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकता।
अदालत का यह कदम आगामी दो जनवरी से साक्ष्य प्रस्तुत करने के आदेश के साथ एक नई दिशा की ओर बढ़ रहा है। इसमें राकेश टिकैत, पूर्व मंत्री दलवीर सिंह और कई पूर्व विधायकों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि लोकतांत्रिक आंदोलनों में शामिल नेतृत्व को अपने कार्यों की वैधानिक जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती है। संपादकीय दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह मामला विलंबित न्याय की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाता है, क्योंकि एक दशक से अधिक समय बाद आरोप तय होना न्याय प्रणाली की धीमी गति को रेखांकित करता है। बहरहाल, अब सबकी नजरें आने वाली तारीखों पर टिकी हैं, जहाँ यह तय होगा कि ग्यारह साल पहले गंगनहर के किनारे उपजा वह आक्रोश कानूनी कसौटी पर किस ओर झुकता है।
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