उत्तर प्रदेश की औद्योगिक नगरी कानपुर में अपराध शाखा और स्थानीय पुलिस ने मिलकर एक ऐसे गिरोह का खुलासा किया है जो शिक्षा व्यवस्था की जड़ों को खोखला कर रहा था। किदवई नगर जैसे व्यस्त इलाके में बैठकर यह गिरोह देश के विभिन्न राज्यों के युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहा था। जांच में यह बात निकलकर सामने आई है कि पकड़े गए आरोपी महज छोटे अपराधी नहीं हैं बल्कि वे एक सुनियोजित सिंडिकेट का हिस्सा हैं जो तकनीकी रूप से काफी सक्षम था। पुलिस ने इस कार्रवाई के दौरान चार मुख्य आरोपियों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया है जबकि इस पूरे तंत्र से जुड़े अन्य संदिग्धों की तलाश में विभिन्न स्थानों पर छापेमारी की जा रही है। यह गिरोह न केवल कानपुर बल्कि उत्तर भारत के कई प्रमुख केंद्रों में अपना आधार जमा चुका था।
शैल ग्रुप ऑफ एजुकेशन के नाम पर फर्जीवाड़े का केंद्र
आरोपियों ने समाज की नजरों में खुद को वैध दिखाने के लिए शैल ग्रुप ऑफ एजुकेशन नामक एक संस्थान का सहारा लिया था। किदवई नगर में संचालित इस कार्यालय के भीतर से ही फर्जी डिग्रियां बनाने और उन्हें बेचने की पूरी रणनीति तैयार की जाती थी। यह गिरोह उन युवाओं को अपना निशाना बनाता था जो बिना मेहनत या बिना परीक्षा दिए ऊंचे पदों की चाह रखते थे या विदेश जाने के लिए शैक्षणिक दस्तावेजों की तलाश में थे। आरोपियों ने मोटी रकम के बदले घर बैठे सर्टिफिकेट उपलब्ध कराने का लालच देकर एक समानांतर शिक्षा प्रणाली खड़ी कर दी थी। पुलिस की शुरुआती जांच में लाखों रुपये के अवैध लेनदेन के प्रमाण मिले हैं जो इस गोरखधंधे की व्यापकता को दर्शाते हैं।
असली जैसी दिखने वाली नकली मार्कशीट का निर्माण
पकड़े गए जालसाज जाली दस्तावेज तैयार करने में माहिर थे। उनके पास से देश की चौदह प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद की हूबहू दिखने वाली मार्कशीट बरामद की गई हैं। ये लोग केवल अंकतालिका ही नहीं बल्कि प्रोविजनल सर्टिफिकेट और माइग्रेशन जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज भी तैयार कर लेते थे। इसके लिए विशेष प्रिंटिंग मशीनों और फर्जी मोहरों का उपयोग किया जाता था ताकि किसी को भी पहली नजर में इनके फर्जी होने का संदेह न हो। तकनीक का सहारा लेकर ये अपराधी असली रजिस्ट्रेशन नंबरों की तरह ही फर्जी नंबर आवंटित कर देते थे जिससे सत्यापन की प्रक्रिया में भी धोखा दिया जा सके।
फर्जी डिग्री के खरीदारों पर भी गिरेगी गाज
कानपुर पुलिस प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि इस मामले में केवल सर्टिफिकेट बनाने वाले ही दोषी नहीं हैं बल्कि वे लोग भी बराबर के भागीदार हैं जिन्होंने पैसे देकर ये डिग्रियां खरीदी हैं। पुलिस अब उन सभी व्यक्तियों की सूची तैयार कर रही है जिन्होंने इस गिरोह से संपर्क कर लाभ उठाया है। कई सरकारी और निजी संस्थानों में इन डिग्रियों के जरिए नौकरी पाने वालों की पहचान की जा रही है। जांच अधिकारियों का मानना है कि आने वाले समय में कुछ बड़े नाम भी इस जांच के दायरे में आ सकते हैं। फिलहाल गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ कर गिरोह के फरार सदस्यों और उनके नेटवर्क के अन्य ठिकानों के बारे में जानकारी जुटाई जा रही है।
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