श्रीलंका के त्रिंकोमाली स्थित सम्पूर तट पर हाल ही में धातु का एक विशालकाय टुकड़ा मिलने के बाद से सोशल मीडिया पर दावों और प्रतिदावों का दौर शुरू हो गया है। धातु के इस मलबे को लेकर कई तरह की भ्रामक खबरें साझा की जा रही हैं जिनमें इसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो की नाकामी या किसी बड़े रॉकेट क्रैश का नाम दिया जा रहा है। हालांकि विज्ञान की दृष्टि और तकनीकी साक्ष्यों को देखें तो यह पूरी कहानी बिल्कुल अलग नजर आती है। असल में यह मलबा किसी विफलता की कहानी नहीं बल्कि भारत के एक और सफल अंतरिक्ष अभियान की गवाही दे रहा है।
क्या है पूरा मामला और क्या है वह धातु का टुकड़ा
श्रीलंका की स्थानीय पुलिस और नौसेना को सम्पूर के तटीय इलाके में धातु का जो हिस्सा मिला है वह असल में भारत के सबसे शक्तिशाली रॉकेट एलवीएम3 के ऊपरी कवच का एक हिस्सा है। इसे अंतरिक्ष विज्ञान की भाषा में पेलोड फेयरिंग कहा जाता है। यह धातु का खोल रॉकेट के सबसे ऊपरी भाग पर लगा होता है जो उसके अंदर रखे कीमती उपग्रहों की रक्षा करता है। जब रॉकेट अपनी उड़ान के दौरान वायुमंडल की मोटी परतों को पार कर अंतरिक्ष के द्वार पर पहुँचता है तब वहां हवा का घर्षण समाप्त हो जाता है और इस भारी सुरक्षा कवच की जरूरत नहीं रह जाती। ऐसी स्थिति में रॉकेट का कंप्यूटर खुद ही इन हिस्सों को अलग कर देता है ताकि वजन कम हो सके और मिशन अपनी मंजिल की ओर तेजी से बढ़ सके।

क्यों इसे विफलता मानना तकनीकी रूप से गलत है?
अक्सर आम लोग रॉकेट के किसी भी हिस्से को गिरते देख उसे हादसा समझ लेते हैं लेकिन अंतरिक्ष अभियानों में यह एक अनिवार्य इंजीनियरिंग प्रक्रिया है। जिस एलवीएम3-एम6 रॉकेट का यह हिस्सा है उसने बीते दिसंबर में अमेरिका के एक बेहद भारी उपग्रह को सफलतापूर्वक उसकी कक्षा में स्थापित किया था। अंतरिक्ष वैज्ञानिक बताते हैं कि रॉकेट के अलग हुए हिस्से पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण वापस नीचे गिरते हैं। इसरो इन हिस्सों के गिरने के लिए पहले ही समुद्र के भीतर एक सुरक्षित क्षेत्र का निर्धारण करता है जिसे 'नो फ्लाई ज़ोन' कहा जाता है। यह हिस्सा भी बंगाल की खाड़ी में ही गिरा था लेकिन अपनी विशेष बनावट और हल्का होने के कारण यह लहरों के साथ बहता हुआ श्रीलंका के तट तक पहुँच गया।
सरकार और इसरो की चुप्पी का क्या है आधार
सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि इस मामले पर आधिकारिक तौर पर कुछ क्यों नहीं कहा गया। जानकारों का कहना है कि अंतरिक्ष क्षेत्र में यह एक बेहद सामान्य और नियमित घटना है। हर साल दुनिया भर से दर्जनों रॉकेट लॉन्च किए जाते हैं और उनके बूस्टर या कवच इसी तरह समुद्र में गिरते हैं। इसरो अपनी हर सफलता की जानकारी सार्वजनिक रूप से साझा करता है लेकिन एक पुराने और नियोजित मलबे का बहकर किनारे आना कोई ऐसी घटना नहीं है जिस पर विशेष बयान जारी किया जाए। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष कानूनों के तहत ऐसे मलबों का प्रबंधन एक मानक प्रक्रिया है जिसका पालन दोनों देशों की एजेंसियां आपस में समन्वय के साथ करती हैं।
अफवाहों का बाज़ार और वास्तविकता की चुनौती
वर्तमान डिजिटल दौर में अधूरी जानकारी अक्सर सनसनी का रूप ले लेती है। त्रिंकोमाली में मिले इस मलबे को 'रॉकेट का ब्रेकडाउन' कहना तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह गलत है। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी हवाई जहाज से उतरने के बाद यात्री की सीढ़ियों को जहाज से अलग किया जाता है। यदि उन सीढ़ियों को कोई देखे और कहे कि जहाज टूट गया है तो यह हास्यास्पद होगा। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम आज वैश्विक स्तर पर सबसे भरोसेमंद माना जाता है और एलवीएम3 रॉकेट इसरो के सबसे सफल और ताकतवर रॉकेटों में से एक है। इसलिए किसी भी ऐसी खबर पर विश्वास करने से पहले यह समझना जरूरी है कि अंतरिक्ष विज्ञान में हर गिरती हुई चीज नाकामी का संकेत नहीं होती बल्कि वह उस उपग्रह की सफलता का प्रमाण होती है जो अंतरिक्ष में अपना काम शुरू कर चुका है।
---समाप्त---