ईरान की धरती इस समय बारूद के ढेर पर बैठी नजर आ रही है। दशकों से दबे हुए गुस्से ने अब एक ऐसी आग का रूप ले लिया है जो पूरे देश को अपनी चपेट में ले चुकी है। सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के खिलाफ जनता का यह विद्रोह केवल महंगाई या आर्थिक संकट तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सीधे तौर पर सत्ता परिवर्तन की मांग में बदल गया है। देश के विभिन्न शहरों से आ रही तस्वीरें बयां कर रही हैं कि सुरक्षा बलों और आम नागरिकों के बीच संघर्ष खूनी होता जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अब तक 60 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि कुछ अपुष्ट खबरें इस आंकड़े को 200 के पार बता रही हैं। इंटरनेट ब्लैकआउट के बावजूद ईरान के भीतर से आ रही खबरें दुनिया को चौंका रही हैं।

राष्ट्रपति के इस्तीफे का दावा और सत्ता में मची खलबली

सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय गलियारों में इस समय एक खबर सबसे तेजी से फैल रही है कि ईरान के राष्ट्रपति ने अपना इस्तीफा सुप्रीम लीडर को सौंप दिया है। प्रसिद्ध उद्यमी मारियो नफ़ल के दावों ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है। हालांकि आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि जिस तेजी से हालात बिगड़े हैं और शासन के भीतर दरारें नजर आई हैं, उसमें इस्तीफा कोई बड़ी बात नहीं होगी। यह स्थिति सीरिया में असद शासन के अचानक पतन की याद दिला रही है, जहां सत्ता का ढांचा ताश के पत्तों की तरह बिखर गया था। अगर राष्ट्रपति वाकई पीछे हटते हैं, तो यह ख़ामेनेई के लिए अब तक का सबसे बड़ा राजनीतिक झटका साबित होगा।

रजा पहलवी की एंट्री और ट्रंप से लगाई गई गुहार

इस पूरे संकट के बीच निर्वासित राजकुमार रजा पहलवी एक बार फिर ईरान की राजनीति के केंद्र में आ गए हैं। सड़कों पर प्रदर्शनकारी अब पहलवी के समर्थन में नारे लगा रहे हैं, जो सीधे तौर पर 1979 की क्रांति के बाद स्थापित इस्लामी शासन को चुनौती है। पहलवी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से संपर्क साधकर ईरान में सीधे हस्तक्षेप की अपील की है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि ईरानी जनता अब शासन से मुक्ति चाहती है और इसके लिए अंतरराष्ट्रीय मदद की दरकार है। ट्रंप ने भी संकेत दिए हैं कि वे ईरान में आजादी की इस लहर पर करीब से नजर बनाए हुए हैं, जिससे तेहरान के हुक्मरानों की नींद उड़ी हुई है।

सुप्रीम लीडर की चुनौती और विदेशी साजिश का राग

आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई ने इस पूरी हिंसा को विदेशी ताकतों और दुश्मनों की साजिश करार दिया है। उन्होंने अपने हालिया बयानों में स्पष्ट कहा है कि बाहरी देश ईरान को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं। ख़ामेनेई ने डोनाल्ड ट्रंप को भी खुली चेतावनी दी है, लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। प्रदर्शनकारी अब केवल नारों तक सीमित नहीं हैं, वे सरकारी इमारतों को निशाना बना रहे हैं और सुरक्षा घेरों को तोड़ रहे हैं। विदेशी साजिश का आरोप लगाकर जनता को शांत करने का पुराना तरीका अब काम आता नहीं दिख रहा है।


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क्या खत्म होने वाला है दशकों पुराना शासन?

ईरान में मौजूदा हालात किसी निर्णायक मोड़ की तरफ इशारा कर रहे हैं। आर्थिक संकट ने जनता की कमर तोड़ दी है और रियाल की गिरती कीमत ने लोगों को सड़कों पर मरने-मारने के लिए मजबूर कर दिया है। यदि सुरक्षा बल प्रदर्शनकारियों के साथ खड़े हो जाते हैं या अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता है, तो ख़ामेनेई सरकार का गिरना तय माना जा रहा है। सवाल अब यह नहीं है कि सत्ता बदलेगी या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि यह बदलाव कितना हिंसक होगा और आने वाले समय में ईरान की कमान किसके हाथों में होगी। क्या पहलवी की वापसी होगी या ईरान एक नए लोकतंत्र की ओर बढ़ेगा, यह आने वाले कुछ दिन तय कर देंगे।

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