भारत और चीन के रिश्तों में पिछले कुछ वर्षों से जो बर्फ जमी थी, वह अब पिघलती दिख रही है, लेकिन इसकी कीमत क्या होगी, यह एक बड़ा सवाल है। साल 2020 में गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद देश में 'बॉयकॉट चाइना' की जो लहर चली थी, सरकार अब उससे पीछे हटती नजर आ रही है। रायटर्स की हालिया रिपोर्ट दावा करती है कि भारत सरकार उन कड़े नियमों में ढील देने पर विचार कर रही है, जिन्होंने चीनी कंपनियों को भारतीय सरकारी ठेकों से दूर रखा था। जिस समय सीमा पर तनाव चरम पर था, तब चीन को 'लाल आँख' दिखाने का वादा किया गया था, परंतु अब वही सरकार चीनी निवेश के लिए 'लाल कालीन' बिछाने की तैयारी में है। वित्त मंत्रालय का यह संभावित कदम उन 350 से अधिक चीनी ऐप्स, वीजा प्रतिबंधों और कड़े निवेश नियमों के बाद एक बड़ा यू-टर्न माना जा रहा है, जिन्हें सुरक्षा कारणों से लागू किया गया था।
परियोजनाओं की सुस्त रफ्तार और संसाधनों का संकट
इस नीतिगत बदलाव के पीछे सबसे बड़ा तर्क विकास की गति को बताया जा रहा है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि बिजली और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में चीनी उपकरणों और विशेषज्ञों की कमी के कारण कई बड़े प्रोजेक्ट्स लटके हुए हैं। भारत ने अगले दशक में अपनी थर्मल पावर क्षमता को 307 गीगावाट तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, और विशेषज्ञों का मानना है कि चीनी तकनीक के बिना इसे समय पर पूरा करना चुनौतीपूर्ण है। कई मंत्रालयों ने इस पाबंदी से छूट मांगी है ताकि वे अपने लक्ष्य हासिल कर सकें। पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गौबा की अध्यक्षता वाली समिति ने भी प्रतिबंधों में ढील देने की सिफारिश की है, जो इस बात का संकेत है कि सरकार अब कूटनीति से ज्यादा आर्थिक व्यावहारिकता को प्राथमिकता दे रही है।
स्वदेशी कंपनियों पर मंडराता संकट और शेयर बाजार का डर
जैसे ही चीनी कंपनियों की वापसी की खबरें बाजार में फैलीं, भारतीय कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई। बीएचईएल और एलएंडटी जैसी दिग्गज कंपनियों के शेयर टूटना इस बात का प्रमाण है कि बाजार को चीनी प्रतिस्पर्धा का डर सता रहा है। चीनी कंपनियां अक्सर बेहद कम कीमतों पर बोली लगाती हैं, जिससे भारतीय मैन्युफैक्चरर्स के लिए उनके सामने टिकना मुश्किल हो जाता है। अगर यह पाबंदी हटती है, तो 'मेक इन इंडिया' और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों को गहरा धक्का लग सकता है। सरकार के इस कदम से यह सवाल खड़ा होता है कि क्या हम अपनी सामरिक सुरक्षा और घरेलू उद्योगों के हितों को दांव पर लगाकर चीनी ड्रैगन को फिर से भारतीय बाजार सौंपने जा रहे हैं।
प्रधानमंत्री कार्यालय के पाले में अंतिम फैसला
हालांकि वित्त मंत्रालय और विभिन्न विभागों के बीच इस पर गहन मंथन चल रहा है, लेकिन अंतिम मुहर प्रधानमंत्री कार्यालय को ही लगानी है। डोनाल्ड ट्रंप की नई टैरिफ नीतियों और वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों के बदलते दौर में भारत अब चीन के साथ व्यापारिक रिश्तों को सामान्य करने की कोशिश कर रहा है। हवाई सेवाओं की बहाली और वीजा नियमों में ढील इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। विपक्षी दल इसे सरकार की विफलता बता रहे हैं, जबकि समर्थक इसे एक संतुलित आर्थिक कदम मान रहे हैं। अब देखना यह होगा कि क्या सरकार राष्ट्रीय गौरव और सीमा की सुरक्षा को आर्थिक विकास के साथ संतुलित कर पाएगी या फिर चीन एक बार फिर भारत की अर्थव्यवस्था में अपनी गहरी पैठ बनाने में सफल हो जाएगा।
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