हरियाणा की सुनारिया जेल में उम्रकैद काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम की रिहाई का रास्ता एक बार फिर साफ हो गया है। प्रशासन ने उसे 40 दिनों की पैरोल मंजूर कर दी है, जिसके बाद वह रोहतक की जेल से निकलकर सिरसा स्थित अपने डेरे में समय बिताएगा। यह फैसला उस समय आया है जब समाज का एक बड़ा वर्ग न्याय व्यवस्था की कठोरता और उसमें मिलने वाली ऐसी ढील के बीच के अंतर को देख रहा है। दुष्कर्म और हत्या जैसे जघन्य अपराधों के दोषी को बार-बार मिलती यह राहत केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं बल्कि व्यवस्था की मंशा पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

कानूनी प्रक्रिया की आड़ और नैतिक सवाल

​प्रशासन का तर्क है कि पैरोल देना कैदी का अधिकार है और यह पूरी तरह नियमों के दायरे में रहकर किया गया है। लेकिन जब मामला ऐसे व्यक्ति का हो जो हजारों अनुयायियों को प्रभावित करता है और जिसके अपराधों ने देश को झकझोर कर रख दिया था, तो नियम की शुष्कता के पीछे छिपी नैतिकता धुंधली पड़ने लगती है। 40 दिनों की यह अवधि राम रहीम के लिए जेल की कालकोठरी से दूर एक खुली हवा की सांस होगी, लेकिन उन पीड़ितों के लिए यह किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं है जिन्होंने बरसों तक न्याय की लड़ाई लड़ी है। जेल से बाहर आने की यह निरंतरता न्याय की उस गरिमा को चुनौती देती है जिसे कानून की किताबों में सर्वोपरि माना गया है।

सियासत और समय का अजीब संयोग

​राम रहीम की पैरोल और फरलो का इतिहास देखें तो इसका सीधा संबंध अक्सर चुनावी सरगर्मियों या विशेष राजनीतिक घटनाक्रमों से जुड़ा रहा है। हालांकि इस बार प्रशासन ने सख्त शर्तें लागू की हैं कि वह सिरसा डेरा परिसर से बाहर किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में हिस्सा नहीं ले सकेगा, फिर भी डिजिटल माध्यमों और अनुयायियों के माध्यम से उसका प्रभाव कम नहीं होता। जब-जब जेल के दरवाजे राम रहीम के लिए खुलते हैं, विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ता इसे वोट बैंक की राजनीति से जोड़कर देखते हैं। यह महज इत्तेफाक है या कोई गहरी रणनीति, यह विचारणीय है कि आखिर संगीन अपराधियों को मिलने वाली इस उदारता का आधार क्या केवल 'अच्छा आचरण' ही है?

सुरक्षा का घेरा और निगरानी की चुनौती

​सिरसा डेरा में 40 दिन बिताने के दौरान राम रहीम प्रशासन की पैनी नजर में रहेगा। पुलिस की कड़ी सुरक्षा और कड़े नियमों के बीच उसकी रिहाई की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या जेल प्रशासन और सरकार उन अदृश्य संदेशों को रोक पाएंगे जो डेरे की दीवारों के भीतर से बाहर की दुनिया को प्रभावित करते हैं? पैरोल खत्म होने के बाद उसे वापस सुनारिया जेल में आत्मसमर्पण करना होगा, लेकिन तब तक न्याय की निष्पक्षता पर उठने वाले सवालों की फेहरिस्त और लंबी हो चुकी होगी।


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