उत्तरप्रदेश के गाजियाबाद के मुरादनगर में एंटी करप्शन ब्यूरो की हालिया कार्रवाई ने पुलिस महकमे के भीतर छिपे उन चेहरों को सार्वजनिक कर दिया है, जो कानून की आड़ में निजी स्वार्थ साध रहे थे। महिला दारोगा प्रिया सिंह और हेड कांस्टेबल शाहिद की गिरफ्तारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पद और वर्दी की गरिमा को ताक पर रखने वालों के लिए शासन की 'जीरो टॉलरेंस' नीति में कोई जगह नहीं है। जहाँ एक ओर उत्तर प्रदेश पुलिस के हजारों जवान और अधिकारी अपनी जान जोखिम में डालकर समाज की सेवा कर रहे हैं, वहीं इन जैसे कुछ मुट्ठी भर लोग अपनी काली करतूतों से पूरे विभाग की साख पर दाग लगाने का दुस्साहस करते हैं।

कानूनी शक्ति का दुरुपयोग और वसूली की साजिश

मुरादनगर की इस घटना में आरोपी दारोगा और हेड कांस्टेबल ने एक दहेज प्रताड़ना के मुकदमे को अनुचित लाभ लेने का जरिया बना लिया था। पीड़ित लेखपाल के पास न्यायालय से सुरक्षा होने के बावजूद, ये दोनों कथित तौर पर उसे जेल भेजने और परिवार का नाम मुकदमे में शामिल रखने का डर दिखाकर मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे थे। 2 लाख रुपये की मांग और फिर 50 हजार रुपये की डील तय करना यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार की मंशा रखने वाले कर्मियों के मन में कानून का रत्ती भर भी भय नहीं होता। विवेचना अधिकारी के रूप में मिली शक्ति का इस्तेमाल सच को सामने लाने के बजाय, इन्होंने कथित रूप से निर्दोषों को डराने और उनसे धन उगाही करने के लिए किया।

सिस्टम के लूपहोल: जांच और वारंट जब बन जाएं हथियार


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यह मामला व्यवस्था के उन गंभीर 'लूपहोल्स' (खामियों) की ओर भी इशारा करता है, जहां मुकदमों की जांच और कोर्ट से जारी होने वाले वारंट को भ्रष्टाचार का हथियार बना लिया जाता है। दरअसल, किसी भी मुकदमे में किसी का नाम हटाना या नई धाराएं जोड़ना पूरी तरह से विवेचना अधिकारी (IO) की रिपोर्ट पर टिका होता है। स्वतंत्र बाहरी निगरानी के अभाव में यही 'विवेकाधिकार' भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी वजह बन जाता है। इसी तरह, अदालती वारंट तामील करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी का फायदा उठाकर अक्सर लोगों को डराने और मजबूर करने का खेल खेला जाता है। अक्सर देखा गया है कि झूठी शिकायतों पर भी जांच के नाम पर यही खेल होता है और कोर्ट से आए वारंट को भी कुछ भ्रष्ट कर्मी वसूली का जरिया बना लेते हैं।

सख्ती के दावों के बीच खाद-पानी पाता भ्रष्टाचार

प्रशासनिक स्तर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन नियमों के भीतर मौजूद कई खामियां आज भी इन रिश्वतखोरों का बचाव करती हैं। जाँच अधिकारियों पर किसी भी प्रकार की बाहरी निगरानी न होना और गलत विवेचना करने पर तत्काल सख्त सजा का कोई कड़ा प्रावधान न होना ही भ्रष्टाचार को खाद-पानी देता है। मुरादनगर की महिला दारोगा प्रिया सिंह अभी 2023 बैच की नई भर्ती थीं, जिनका सेवा के शुरुआती दौर में ही इस तरह भ्रष्टाचार में लिप्त होना यह संकेत देता है कि सिस्टम की गंदगी कितनी गहरी है कि नई पौध भी इसमें बड़ी जल्दी समाहित हो रही है। जब तक विवेचना को डिजिटल निगरानी के दायरे में नहीं लाया जाएगा और झूठी शिकायतों पर पुलिस की मनमानी को नहीं रोका जाएगा, तब तक भ्रष्टाचार के ये दीमक आम आदमी के न्याय और विश्वास को ऐसे ही खोखला करते रहेंगे।

यह कार्रवाई यह भी साबित करती है कि महकमे के भीतर सफाई की प्रक्रिया निरंतर जारी है। पूरे पुलिस बल को कटघरे में खड़ा करने के बजाय, उन विशिष्ट व्यक्तियों को चिन्हित कर दंडित करना जरूरी है जो अनुशासन की लक्ष्मण रेखा लांघते हैं। रंगे हाथों पकड़े जाने के बाद हुई इन दोनों की गिरफ्तारी समाज में यह भरोसा जगाती है कि न्याय की राह में रोड़ा बनने वाले अपने ही विभाग के लोग क्यों न हों, उनका अंजाम जेल की सलाखें ही होगा।

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