29 जुलाई 2016 की वह काली रात, जिसने देश की कानून-व्यवस्था के दावों को हाईवे पर ही दफन कर दिया था, उसका अंतिम फैसला अब 9 साल बाद आने वाला है। कल, यानी 22 दिसंबर को अदालत जुबेर, साजिद, धर्मवीर और नरेश समेत पांच दोषियों की सजा मुकर्रर करेगी। आरोपियों को दोषी करार दिया जा चुका है, लेकिन इस फैसले के साथ ही भारतीय न्याय प्रणाली की कार्यशैली पर एक गहरा प्रहार भी हुआ है। आखिर क्यों एक मासूम की रूह कांपने वाली चीखों को सुनने में सिस्टम को एक दशक लग गया?
नेशनल हाईवे नहीं, हैवानियत का चारागाह
नोएडा से शाहजहांपुर जा रहे एक हंसते-खेलते परिवार के लिए नेशनल हाईवे-91 उस रात मौत से भी बदतर मंजर लेकर आया था। बदमाशों ने लूटपाट के लिए कार रुकवाई और फिर जो हुआ उसने मानवता को शर्मसार कर दिया। मां और उनकी 14 साल की बेटी को खेत में घसीटकर ढाई घंटे तक पांच दरिंदों ने अपनी हवस का शिकार बनाया। उस मासूम बच्ची ने अपने मासिक धर्म (Periods) का हवाला देकर रहम की भीख मांगी थी, लेकिन उन हैवानों ने एक न सुनी। यह घटना केवल एक अपराध नहीं थी, बल्कि यूपी की सुरक्षा व्यवस्था पर लगा वह बदनुमा दाग थी जिसने 19 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड करने पर मजबूर कर दिया था।
तारीखों के जाल में सिसकता रहा न्याय
आज जब दोषियों को सजा सुनाई जा रही है, तब यह सवाल पूछना लाजिमी है कि क्या 9 साल का समय न्याय है या अन्याय का ही एक हिस्सा? जिस पीड़ित बच्ची ने अपनी आंखों के सामने अपनी और अपनी मां की मर्यादा को लुटते देखा, उसे न्याय पाने के लिए अपनी पूरी किशोरावस्था कोर्ट की चौखट पर गुजारनी पड़ी। न्याय मिलने में हुई इस बेतहाशा देरी ने अपराधियों को न केवल वक्त दिया, बल्कि पीड़ित परिवार को हर तारीख पर उस खौफनाक मंजर को दोबारा जीने पर मजबूर किया। भारतीय न्याय व्यवस्था में 'तारीख-पर-तारीख' का यह अंतहीन सिलसिला किसी भी पीड़ित के घावों पर मरहम लगाने के बजाय उन्हें और कुरेदने का काम करता है।
सिस्टम की विफलता या कछुआ चाल की मजबूरी?
इस मामले का सीबीआई के पास जाना और फिर सालों तक ट्रायल चलना यह दर्शाता है कि जघन्य से जघन्य अपराधों में भी हमारी 'फास्ट ट्रैक' प्रक्रियाएं कछुआ चाल से चलती हैं। जब अपराधी बेखौफ होकर हाईवे पर ढाई घंटे तक तांडव करते हैं, तो उन्हें सजा मिलने में 3,200 से ज्यादा दिन क्यों लग जाते हैं? देरी से मिला न्याय अक्सर अपराधियों के मन से कानून का डर खत्म कर देता है। कल जब कोर्ट इन पांचों के लिए सजा सुनाएगी, तो वह केवल एक कानूनी औपचारिकता नहीं होगी, बल्कि इस सुस्त सिस्टम के लिए एक आत्ममंथन का क्षण भी होगा।
कल के फैसले पर टिकी देश की निगाहें
पूरा देश अब 22 दिसंबर की उस घड़ी का इंतजार कर रहा है जब जज की कलम इन दरिंदों के लिए सजा लिखेगी। हालांकि, समाज के मन में यह टीस हमेशा रहेगी कि क्या फांसी या उम्रकैद जैसी कोई भी सजा उस 9 साल के लंबे और दर्दनाक इंतजार की भरपाई कर पाएगी? असली न्याय वह होता जो इस परिवार को सालों पहले मिलता, ताकि भविष्य के अपराधियों के लिए एक नजीर पेश की जा सके।
---समाप्त---