बुधवार की रात जब शहर अपनी सामान्य रफ्तार में था, तभी गोलियों की तड़तड़ाहट ने सबको सुन्न कर दिया। व्यस्त बाजार के बीचों-बीच करीब साढ़े आठ बजे उस वक्त हड़कंप मच गया जब घात लगाए बैठे हमलावरों ने एक कद्दावर नेता पर अंधाधुंध फायरिंग कर दी। मौके पर मौजूद लोग अभी कुछ समझ पाते, उससे पहले ही अजीजुर रहमान मुसाब्बिर जमीन पर गिर चुके थे। इस हमले की क्रूरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हमलावर भीड़ का फायदा उठाकर बड़ी आसानी से ओझल हो गए। मुसाब्बिर, जो पहले एक बड़े दल की युवा इकाई का मुख्य चेहरा रह चुके थे, उनकी मौके पर ही जान चली गई और उनके साथ मौजूद एक अन्य शख्स जीवन और मौत के बीच झूल रहा है।
सिलसिलेवार साजिश का खौफनाक अध्याय
यह कोई पहली बार नहीं है जब बांग्लादेश की सड़कों पर इस तरह खून बहा है। गौर करने वाली बात यह है कि मुसाब्बिर की हत्या से महज दो दिन पहले ही ढाका में एक अन्य सक्रिय नेता को भी इसी अंदाज में मौत के घाट उतारा गया था। पिछले महीने हुई एक और हत्या ने पहले ही सुरक्षा व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया था। एक के बाद एक होती ये वारदातें किसी बड़े और सुनियोजित षड्यंत्र की ओर इशारा कर रही हैं। इन घटनाओं ने न केवल कार्यकर्ताओं के मन में दहशत भर दी है, बल्कि आम नागरिकों के मन में भी यह डर बैठा दिया है कि क्या आने वाले बड़े दिन पर वे सुरक्षित घर लौट पाएंगे। हर हत्या के साथ एक ही सवाल गूंज रहा है कि अगला नंबर किसका होगा।
कानून और आचार संहिता की उड़ती धज्जियां
पूरे बांग्लादेश में कड़ी आचार संहिता लागू होने के बावजूद हत्यारों के हौसले बुलंद हैं। पुलिस की गश्ती और सुरक्षा जांच के दावों के बीच हमलावर हथियारों के साथ सरेआम घूम रहे हैं। प्रशासन ने हालांकि जांच के लिए विशेष टीमों का गठन कर दिया है, लेकिन अब तक की कार्रवाई ढाक के तीन पात ही साबित हुई है। किसी भी मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी न होना यह बताने के लिए काफी है कि अपराधियों को कानून का कोई भय नहीं है। इस नाकामी ने उन दावों की पोल खोल दी है जिनमें निष्पक्ष और शांतिपूर्ण माहौल की बात कही जा रही थी। ढाका के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि यह विफलता प्रशासनिक नहीं, बल्कि गहरी राजनीतिक मिलीभगत का परिणाम है।
आगामी तारीख को लेकर गहराता तनाव
जैसे-जैसे 12 फरवरी की तारीख करीब आ रही है, वैसे-वैसे बांग्लादेश की फिजाओं में तनाव बढ़ता जा रहा है। विपक्षी खेमे का स्पष्ट आरोप है कि यह पूरी हिंसा उन्हें मैदान से बाहर करने और समर्थकों के मन में असुरक्षा पैदा करने के लिए की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की पैनी नजर के बावजूद जिस तरह से लक्षित हत्याएं हो रही हैं, उसने लोकतंत्र के भविष्य पर धुंध छा दी है। यदि हिंसा का यह नंगा नाच तुरंत नहीं रुका, तो आने वाले दिनों में स्थिति और भी भयावह हो सकती है। ढाका की सड़कों पर फैला यह खून आने वाले समय में एक बड़े नागरिक संघर्ष की चेतावनी दे रहा है, जहां बैलेट पेपर से पहले बुलेट अपनी ताकत दिखा रही है।
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