सिद्धार्थनगर जिले का डुमरियागंज इलाका इस समय दहशत और आक्रोश के दोराहे पर खड़ा है। सिकहरा कोहड़ा गांव में शनिवार की काली रात ने जो जख्म दिए हैं, उनकी टीस अब पुलिस प्रशासन के खिलाफ गुस्से में तब्दील होने लगी है। मोहम्मद शकील और किसलावती के घरों से 10 लाख रुपये से अधिक के जेवरात पार कर ले जाने वाले लुटेरे आज भी खुले आसमान के नीचे घूम रहे हैं, जबकि पीड़ित परिवार अपनी जमा-पूंजी गंवाकर इंसाफ की उम्मीद में थाने की चौखट नाप रहा है। विडंबना देखिए कि आधुनिक तकनीक और सर्विलांस का दंभ भरने वाली पुलिस को 48 घंटे बाद भी अंधेरे में तीर चलाने के अलावा कुछ हासिल नहीं हुआ है।

वर्दी पर उठते सवाल और फायरिंग का रहस्य

इस पूरी वारदात में सबसे चौंकाने वाला पहलू पुलिस का वह रवैया है, जिसने घटना की गंभीरता पर ही पर्दा डालने की कोशिश की है। पीड़ित मोहम्मद शकील चीख-चीख कर कह रहे हैं कि चोरों ने भागते समय दो राउंड गोलियां चलाई थीं, जिससे गांव वाले सहम गए। इसके विपरीत, जिम्मेदार पुलिस अधिकारी अब तक फायरिंग की बात को सिरे से खारिज कर रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या पुलिस अपनी नाकामी छुपाने के लिए मामले को महज एक साधारण चोरी का रूप देना चाहती है? अगर बदमाशों के पास असलहे नहीं थे, तो निहत्थे ग्रामीणों को उन्हें दबोचने से किसने रोका? पुलिस का यह इनकार अपराधियों के हौसले पस्त करने के बजाय ग्रामीणों के भरोसे को तोड़ रहा है।

सुरक्षा के नाम पर सिर्फ आश्वासनों की खानापूर्ति

घटना के बाद से गांव में दहशत का माहौल है। पुरुष रातों को जागकर लाठी-डंडों के साये में पहरेदारी कर रहे हैं क्योंकि उन्हें अब खाकी की गश्त पर यकीन नहीं रहा। जांच के नाम पर अब तक केवल संदिग्धों से पूछताछ और सीसीटीवी फुटेज खंगालने की रटी-रटाई दलीलें दी जा रही हैं। धरातल पर न तो कोई गिरफ्तारी हुई है और न ही लूटे गए माल की बरामदगी की कोई दिशा तय हो पाई है। यह सुस्ती अपराधियों के लिए सुरक्षित गलियारा तैयार कर रही है। ग्रामीण अब इस टालमटोल वाली नीति को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं और तहसील घेराव की चेतावनी दी जा चुकी है।

जवाबदेही से बचता प्रशासन और बढ़ती नाराजगी

एक तरफ जिले के आला अधिकारी अपराध मुक्त समाज का दावा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ सरेआम फायरिंग कर भागने वाले लुटेरे पुलिस की कार्यप्रणाली को ठेंगा दिखा रहे हैं। यदि जल्द ही ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला केवल एक चोरी तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि प्रशासन के खिलाफ एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले लेगा। अब समय आ गया है कि पुलिस कागजी खानापूर्ति छोड़कर जमीन पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराए और उन हाथों में हथकड़ियां डाले जिन्होंने एक पूरे गांव की नींद उड़ा रखी है। जनता को आश्वासन नहीं, बल्कि सलाखों के पीछे अपराधी चाहिए।


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