उत्तर प्रदेश के बांदा जिले से एक प्रशासनिक आदेश की कॉपी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है, जिसने सरकारी मशीनरी और एक बड़े मीडिया घराने के बीच के रिश्तों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रंजीत यादव नामक एक फेसबुक यूजर ने इस आदेश को साझा करते हुए इसे 'दैनिक जागरण का खेल' करार दिया है। मामला स्कूलों में बच्चों के लिए समाचार पत्र उपलब्ध कराने से जुड़ा है, लेकिन जिस तरह से एक विशेष अखबार को प्राथमिकता दी गई है, उसने प्रशासनिक शुचिता और पारदर्शिता की पोल खोलकर रख दी है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या बांदा का जिला प्रशासन किसी व्यावसायिक समूह के दबाव में काम कर रहा है या यह किसी बड़े राजनीतिक रसूख का परिणाम है?
प्रशासनिक निष्पक्षता और रसूख का घालमेल
ज
रंजीत यादव ने अपनी पोस्ट में तीखा प्रहार करते हुए पूछा है कि जैसे ही स्कूलों में अखबार भेजने की योजना बनी, वैसे ही जागरण समूह ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सरकारी स्कूलों के लिए केवल 'दैनिक जागरण' का ही चुनाव क्यों किया गया? क्या 'हिंदुस्तान' या 'अमर उजाला' जैसे अन्य प्रमुख अखबार इस मानक पर खरे नहीं उतरते थे? जब प्रशासन खुद किसी एक अखबार का सेल्स एजेंट बन जाए, तो उसकी निष्पक्षता पर संदेह होना स्वाभाविक है। यह आदेश स्पष्ट रूप से एक 'मोनोपॉली' यानी एकाधिकार की ओर इशारा करता है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।

स्थानीय पत्रकारिता और विविधता पर प्रहार
बांदा जैसे जिलों में दर्जनों स्थानीय और छोटे अखबार दशकों से संघर्ष कर रहे हैं। जिलाधिकारी का यह कदम न केवल बड़े मीडिया घरानों के पक्ष में झुका हुआ दिखता है, बल्कि यह उन छोटे अखबारों के अस्तित्व को भी खतरे में डालता है जिन्हें प्रशासन को प्रोत्साहित करना चाहिए था। रंजीत यादव का तर्क है कि जागरण की खबरों की मानसिकता और कार्यशैली जगजाहिर है, ऐसे में बच्चों के मानसिक विकास के लिए उसे एकमात्र विकल्प बनाना भविष्य की पीढ़ी के साथ वैचारिक खिलवाड़ हो सकता है। क्या प्रशासन ने इस आदेश को जारी करने से पहले अखबार की विश्वसनीयता और उसकी सामग्री की समीक्षा की थी?
संदेह के घेरे में 'विशेष प्रेम' और जवाबदेही
यह चर्चा का विषय बन चुका है कि क्या बांदा के अधिकारियों के पास कोई ऐसी मजबूरी थी जिसके कारण उन्हें केवल एक ही अखबार के पक्ष में पत्र जारी करना पड़ा। अक्सर बड़े मीडिया हाउस अपने रसूख का इस्तेमाल कर अधिकारियों पर दबाव बनाते हैं, ताकि सरकारी बजट का बड़ा हिस्सा उनकी झोली में जा सके। रंजीत यादव की इस पोस्ट ने अब शासन-प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया है। यह मामला केवल एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक 'सेटिंग' की ओर इशारा करता है जहाँ जनता के संसाधनों का इस्तेमाल खास व्यावसायिक हितों को साधने के लिए किया जाता है। अब देखना यह है कि क्या इस पर कोई उच्च स्तरीय समीक्षा होगी या रसूख का यह खेल बदस्तूर जारी रहेगा।
---समाप्त---