उत्तर प्रदेश के बरेली में हुई हालिया हिंसा ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या किसी की निजी संपत्ति और मेहनत से खड़ा किया गया व्यवसाय सुरक्षित है। शहर के बीचों-बीच स्थित एक कैफ़े के मालिक शैलेन्द्र गंगवार आज अपनी खाली दुकान और टूटे हुए सामान को देखकर केवल अफसोस जता सकते हैं। जिस स्थान पर युवाओं की रौनक हुआ करती थी, वहां अब पुलिसिया कार्रवाई की दहशत और भीड़ के हमले की यादें शेष हैं। शैलेन्द्र ने अपनी आंखों के सामने उस मंजर को देखा है जब एक सुनियोजित तरीके से भीड़ उनके व्यवसाय को निशाना बनाने पहुँची थी। यह हमला केवल ईंट-पत्थरों पर नहीं, बल्कि एक नागरिक के मौलिक अधिकारों पर था।
शैलेन्द्र गंगवार की आँखों देखी
इस पूरी घटना के दौरान जो खौफ पैदा हुआ, उसका अंदाजा मालिक के बयान से लगाया जा सकता है। घटना का जिक्र करते हुए शैलेन्द्र ने एक पत्रकार को अपनी व्यथा सुनाई।
उन्होंने बताया कि “उस दिन 20 से 25 लोग अचानक उनके कैफे में घुस गए थे और उन्होंने जमकर तोड़फोड़ की थी। बाकी 30 के करीब लोग बाहर खड़े थे, जिससे वहां बिल्कुल दहशत वाला माहौल बन गया था। उन्होंने भारी मन से यह भी साझा किया कि जबसे ये घटना हुई है, उनके कैफे पर एक भी कस्टमर नहीं आया है और लोगों में डर का माहौल अभी भी बरकरार है। ”
यह बयान साफ करता है कि भीड़ तंत्र ने केवल भौतिक नुकसान नहीं पहुँचाया, बल्कि व्यापार की रीढ़ यानी ग्राहकों के भरोसे को भी तोड़ दिया है।
जीरो टॉलरेंस और कार्रवाई का सवाल
एक तरफ राज्य सरकार 'जीरो टॉलरेंस' और कानून के राज का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ बरेली की यह घटना प्रशासन की सक्रियता पर सवालिया निशान लगाती है। शैलेन्द्र ने इस मामले में दो लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया है, लेकिन क्या कानूनी प्रक्रिया की यह गति पीड़ित को न्याय दिला पाएगी। उपद्रवियों ने जिस बेखौफ अंदाज में प्रॉपर्टी में घुसकर उत्पात मचाया, वह दर्शाता है कि उन्हें कानून का जरा भी डर नहीं था। धर्म और विचारधारा के नाम पर सड़कों पर उतरने वाले इन लोगों की वजह से आज न केवल शैलेन्द्र, बल्कि उनके कैफ़े में काम करने वाले कई कर्मचारियों के घर का राशन भी संकट में पड़ गया है।
धर्म का उन्माद और उजड़ती रोजी-रोटी
यह समझना कठिन है कि किसी निजी संपत्ति को तहस-नहस करने से किस धर्म की रक्षा होती है। जो भीड़ खुद बेरोजगारी का शिकार है, वह दूसरों के रोजगार को छीनने में अपनी बहादुरी समझ रही है। अफीम बने इस धर्म के नशे ने लोगों की सोचने-समझने की शक्ति को कुंद कर दिया है। बरेली के इस कैफ़े मालिक की कहानी देश के उन तमाम छोटे व्यापारियों की चेतावनी है, जो हर दिन शांतिपूर्ण माहौल में अपना काम करना चाहते हैं। जब तक सरकार और समाज ऐसे असामाजिक तत्वों के खिलाफ एकजुट नहीं होंगे, तब तक शैलेन्द्र जैसे लोग अपनी ही ज़मीन पर बेगाने और असुरक्षित महसूस करते रहेंगे।
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