देशभर में शुक्रवार की सुबह भारी सियासी घमासान के साथ शुरू हुई। मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर और करीब तेरह करोड़ मतदाताओं के नाम काटे जाने के गंभीर आरोपों को लेकर कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। राजधानी दिल्ली से लेकर पटना, देहरादून, लखनऊ, कोलकाता, शिमला, चंडीगढ़ और गुवाहाटी तक सड़कों पर जमकर बवाल देखने को मिला। देहरादून में कांग्रेस के कार्यकर्ता बेकाबू होकर पुलिस बैरिकेडिंग पर चढ़ गए, जिससे काफी देर तक अफरा-तफरी मची रही। वहीं बिहार की राजधानी पटना में माहौल तब बेहद तनावपूर्ण हो गया जब प्रदर्शनकारियों ने सचिवालय और मुख्य चौराहों की तरफ बढ़ने की कोशिश की। भीड़ को रोकने के लिए प्रशासन ने वाटर कैनन का सहारा लिया और पानी की तेज बौछारें छोड़ीं, जिसके बाद पुलिसकर्मियों और कार्यकर्ताओं के बीच तीखी धक्का-मुक्की हुई। दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनता दल के कार्यकर्ताओं ने पटना के इनकम टैक्स चौराहे पर पहुंचकर ज्ञानेश कुमार का पुतला फूंका और चुनाव आयोग के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र संगठन आईसा की नेता नेहा बोरा के आह्वान पर जुटे प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिस ने पहले से ही तगड़ी किलेबंदी कर रखी थी, जहां से प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ-साथ दीपांकर भट्टाचार्य और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को पुलिस ने हिरासत में लेकर बसों में भर दिया।

​सड़क पर मचे इस घमासान के बीच यह मामला देश की सबसे बड़ी अदालतों की चौखट तक भी पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में चुनाव आयोग द्वारा एसआईआर के तहत लिए गए तमाम नीतिगत फैसलों, जारी दिशानिर्देशों और सॉफ्टवेयर में किए गए तकनीकी बदलावों को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित करने की गुहार लगाई गई है। साथ ही बड़े पैमाने पर वोटरों के नाम हटाने के मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल यानी एसआईटी गठित करने की मांग की गई है। उधर बॉम्बे हाईकोर्ट में भी महाराष्ट्र की मतदाता सूची में एसआईआर को लेकर दो अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें पूरी रिवीजन प्रक्रिया को कठघरे में खड़ा किया गया है। याचिकाकर्ताओं का साफ कहना है कि आयोग के दो अन्य चुनाव आयुक्तों की कड़ी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ने मनमाने तरीके से चौदह आदेश जारी कर दिए। यह सारा विवाद दरअसल द इंडियन एक्सप्रेस की उस खोजी रिपोर्ट के बाद भड़का, जिसमें यह दावा किया गया था कि पिछले दस महीनों के दौरान दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आयोग के फैसलों पर कम से कम चौदह बार अपनी लिखित आपत्ति दर्ज कराई थी। इनमें वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने-हटाने, डेटा के केंद्रीकरण और नए नियमों को लेकर गंभीर सवाल उठाए जाने की बात कही गई थी।

​सफाई में उतरा चुनाव आयोग

​अखबार की रिपोर्ट और विपक्ष के तीखे हमलों के बाद चुनाव आयोग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर विस्तृत बयान जारी कर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। आयोग ने पूरे विवाद पर बिंदुवार सफाई देते हुए कहा कि किसी भी बहुसदस्यीय संस्था में अलग-अलग राय, सुझाव या आपत्तियां आना पूरी तरह स्वाभाविक और स्वस्थ परंपरा है। जब तक कोई फैसला अंतिम रूप से नहीं ले लिया जाता, तब तक आंतरिक चर्चा और मतभेद होना फैसले में पारदर्शिता और कानूनी मजबूती लाता है, लेकिन अंततः सभी नीतिगत फैसले पूरी तरह सर्वसम्मति से ही तय किए जाते हैं। मतदाता सूची से नाम काटे जाने के आरोपों पर आयोग ने स्पष्ट किया कि वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने या हटाने का अधिकार दिल्ली में बैठे अधिकारियों के पास नहीं, बल्कि राज्यों में जिला स्तर पर तैनात ईआरओ और डीईओ के पास होता है, जो तय नियमों के तहत ही काम करते हैं। इसके अलावा डेटा सुरक्षा पर उठ रहे सवालों को खारिज करते हुए आयोग ने भरोसा दिलाया कि उनका ईसीआई-नेट डिजिटल प्लेटफॉर्म कड़े सुरक्षा मानकों, आईटी ऑडिट और प्रोटोकॉल के तहत संचालित होता है, जिसमें किसी भी स्तर पर अनाधिकृत छेड़छाड़ की कोई गुंजाइश नहीं है। आयोग ने यह भी दर्द बयां किया कि पिछले दस महीनों की कुछ अंदरूनी चर्चाओं को उछालकर अधूरी और भ्रामक तस्वीर पेश की जा रही है, जबकि इसी दौरान करीब चालीस बड़े चुनावी सुधार लागू किए गए और देश के कई प्रमुख राज्यों में भारी प्रशासनिक बंदोबस्त के साथ निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न कराए गए हैं। हालांकि फॉर्म-6 में नए सवाल जोड़ने और गोवा में कुछ वोटरों के नाम हटने से जुड़े तकनीकी दावों पर आयोग ने अपने बयान में कोई सीधी टिप्पणी नहीं की।


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​सियासी पारा चढ़ा

​विपक्षी दलों के तेवर इस कदर तल्ख हो चुके हैं कि संसद से लेकर विधानसभाओं तक इसका सीधा असर दिखने लगा है। जम्मू-कश्मीर विधानसभा के भीतर शुक्रवार को कांग्रेस विधायकों ने हाथों में ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे वाले पोस्टर लेकर जमकर हंगामा काटा, जिससे सदन की कार्यवाही बुरी तरह बाधित हुई। कर्नाटक के उप-मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने भी कांग्रेस के रुख का खुलकर समर्थन करते हुए कहा कि वोटर लिस्ट रिवीजन का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ के रायपुर में मूसलाधार बारिश के बावजूद सैकड़ों कांग्रेसी सड़क पर उतरे और राजीव गांधी चौक से मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय तक पैदल मार्च निकाला। इधर तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने सीधा कानूनी रुख अख्तियार करते हुए दिल्ली के संसद मार्ग थाने में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ बाकायदा लिखित शिकायत दर्ज कराई है और वोटरों के नाम नियम विरुद्ध हटाने पर एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। विपक्ष अब छह महीने के भीतर दूसरी बार मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव पेश करने की मजबूत रणनीति तैयार कर रहा है, क्योंकि इससे पहले अप्रैल के महीने में लाया गया प्रस्ताव संख्या बल के अभाव में लोकसभा में गिर गया था।

​राहुल गांधी ने सीधे शब्दों में आरोप लगाते हुए कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने देश के करोड़ों नागरिकों की वोट चोरी की है और उन्होंने सरकार द्वारा उनकी नियुक्ति के समय ही अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया था। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने भी इस आग में घी डालते हुए कहा कि राहुल गांधी कई प्रेस सम्मेलनों में पुख्ता आंकड़े रख चुके हैं और इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम गायब होना कोई मामूली राजनीतिक बयानबाजी नहीं बल्कि लोकतंत्र पर सीधा हमला है। एनडीए गठबंधन के प्रमुख सहयोगी चिराग पासवान ने भी इस संवेदनशील मुद्दे पर संतुलित बयान देते हुए कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को खुद सामने आकर पूरी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए ताकि जनता के भीतर देश की चुनाव व्यवस्था पर अटूट भरोसा कायम रहे। इसी बीच कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने दिल्ली में प्रेस वार्ता कर चुनाव आयुक्त को अड़तालिस घंटे की सीधी चेतावनी देते हुए दो अक्टूबर यानी गांधी जयंती से पूरे देश में चक्का जाम और उग्र आंदोलन की घोषणा कर दी। दीपके ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि आरोप चुनाव आयोग पर लग रहे हैं और उनका जवाब संवित पात्रा दे रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि या तो संवित पात्रा चुनाव आयुक्त बन जाएं या मुख्य चुनाव आयुक्त बीजेपी ज्वॉइन कर लें। वहीं मिली जानकारी के मुताबिक बढ़ते जनाक्रोश और राजधानी में छाए तनाव को देखते हुए चुनाव आयोग ने आनन-फानन में उत्तर प्रदेश के मेरठ और वाराणसी में होने वाले मुख्य चुनाव आयुक्त के आगामी दोनों दौरे स्थगित कर दिए, हालांकि आयोग का कहना है कि यह स्थगन पहले ही तय हो चुका था और इसका मौजूदा सियासी हंगामे से कोई लेना-देना नहीं है।

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