प्रतिबंधित सैटेलाइट फोन के इस्तेमाल और संदिग्ध गतिविधियों के गंभीर आरोपों में घिरे विदेशी नागरिकों को अदालत से बहुत बड़ी कानूनी राहत मिली है। इस मामले में लंबे समय से न्यायिक हिरासत में बंद अमेरिकी नागरिक मैथ्यू डेविड डाइक और उनके साथ गिरफ्तार किए गए 6 यूक्रेनी नागरिकों को अदालत ने बाय डिफॉल्ट जमानत दे दी है। राहत केवल जेल से रिहाई तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि कोर्ट ने मानवीय आधार पर विचार करते हुए इन सभी 7 विदेशी नागरिकों को अपने परिजनों से मिलने के लिए एक महीने की तय अवधि के लिए अपने-अपने देश जाने की विशेष इजाजत भी प्रदान की है। विदेशी नागरिकों पर देश की आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े बेहद सख्त कानून गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम यानी UAPA के साथ-साथ भारतीय वायरलेस टेलीग्राफी और टेलीग्राफ एक्ट के तहत कार्रवाई की गई थी, जिसके चलते यह पूरा मामला कानूनी और कूटनीतिक हलकों में लगातार चर्चा का केंद्र बना हुआ था।

​चार्जशीट पेश न होना बना रिहाई की वजह

​भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता और कानूनी प्रावधानों के अनुसार, UAPA जैसे गंभीर मामलों में भी जांच एजेंसी के ऊपर यह कानूनी बाध्यता होती है कि वह आरोपी की गिरफ्तारी के बाद तय समय सीमा—सामान्यतः नब्बे दिन या विशेष अदालत की औपचारिक अनुमति से अधिकतम एक सौ अस्सी दिन—के भीतर विस्तृत जांच पूरी कर अदालत में आरोप पत्र यानी चार्जशीट दाखिल करे। यदि जांच एजेंसी निर्धारित समयावधि के भीतर अपनी चार्जशीट पेश करने में चूक जाती है या समय सीमा बढ़ाने के लिए जरूरी कानूनी औपचारिकताएं समय रहते पूरी नहीं की जाती हैं, तो आरोपी को वैधानिक अधिकार के तौर पर डिफॉल्ट जमानत हासिल करने का पूरा हक मिल जाता है। इस मामले में भी जांच एजेंसी तय मियाद के भीतर अदालत के समक्ष चार्जशीट पेश करने में विफल रही। इसी तकनीकी और प्रक्रियात्मक चूक को आधार बनाकर बचाव पक्ष के वकीलों ने जोरदार दलीलें रखीं, जिन्हें स्वीकार करते हुए अदालत ने साफ किया कि वैधानिक समय सीमा समाप्त होने के बाद आरोपियों को हिरासत में रखना विधि सम्मत नहीं है, और कोर्ट ने सभी सातों विदेशी नागरिकों को डिफॉल्ट बेल पर रिहा करने का आदेश जारी कर दिया।

​कड़े सुरक्षा नियमों के साथ वतन वापसी की छूट


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​जमानत मिलने के बाद विदेशी नागरिकों की ओर से अदालत के समक्ष विशेष प्रार्थना पत्र दायर कर यह गुहार लगाई गई कि लंबे समय से हिरासत में रहने के चलते वे अपने परिवार से पूरी तरह कटे हुए हैं, लिहाजा उन्हें पारिवारिक और मानवीय आधार पर कुछ समय के लिए घर जाने की अनुमति दी जाए। सामान्य न्यायिक प्रक्रिया में विदेशी नागरिकों को जमानत दिए जाने पर उनका पासपोर्ट अदालत या जांच एजेंसी द्वारा जब्त कर लिया जाता है और उनके देश छोड़ने पर सख्त रोक रहती है ताकि वे ट्रायल छोड़कर फरार न हो सकें। हालांकि, इस मामले में अदालत ने मानवीय पहलुओं, पारिवारिक जरूरतों और परिस्थितियों की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए अपने रुख में नरमी दिखाई और सभी को केवल एक महीने के लिए अमेरिका और यूक्रेन जाने की सशर्त अनुमति प्रदान की।

​कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने के लिए बेहद कड़े सुरक्षा इंतजाम और शर्तें तय की हैं कि आरोपी ट्रायल से बचकर भाग न सकें। अदालत ने सभी आरोपियों को भारी वित्तीय मुचलका जमा करने का निर्देश दिया और उनके स्थानीय अधिवक्ताओं से यह औपचारिक हलफनामा लिया कि वे मामले की नियमित पैरवी सुनिश्चित करेंगे। इसके साथ ही संबंधित विदेशी दूतावासों के स्तर पर भी औपचारिक सत्यापन और आवश्यक व्यवस्थाएं की गई हैं, ताकि एक महीने की निर्धारित मियाद समाप्त होते ही सभी आरोपी वापस भारत लौटें, अदालत में अपनी नियमित उपस्थिति दर्ज कराएं और मामले के अंतिम ट्रायल का सामना करें।

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