बुलंदशहर हाईवे गैंगरेप केस महज़ एक अपराध की फाइल नहीं है, बल्कि यह भारतीय पुलिसिंग के उस स्याह पक्ष की 'इनसाइड स्टोरी' है जहाँ प्रमोशन और वाहवाही के चक्कर में न्याय का गला घोंटा गया। यह कहानी है उस अंधी जांच की, जिसे पुलिस ने अपनी सफलता बताया था, लेकिन अंततः वह उनके गले की फांस बन गई। इस पूरे मामले की सबसे चौंकाने वाली परत तब खुली जब सीबीआई ने पुलिस की गढ़ी हुई पटकथा को दरकिनार कर डीएनए के जरिए असली दरिंदों के चेहरे दुनिया के सामने रखे।
खाकी की जल्दबाजी और बेगुनाहों की गिरफ्तारी
जुलाई 2016 की उस भयावह रात के बाद, उत्तर प्रदेश पुलिस की साख दांव पर थी। राजनीतिक और सामाजिक दबाव इतना था कि पुलिस को तत्काल 'मुजरिम' चाहिए थे। इस 'इनसाइड स्टोरी' का सबसे दर्दनाक हिस्सा तब शुरू हुआ जब ककोड़ थाने की पुलिस ने बबलू और नरेश नाम के दो युवकों को उठाया। असलियत में ये दोनों भाई अपनी बीमार बहन का इलाज कराने गाँव आए थे, लेकिन पुलिस के मुखबिर तंत्र ने उनके समुदाय (बाबरिया) को देखते हुए उन्हें संदिग्ध बता दिया।
सूत्रों के मुताबिक, थाने के भीतर उन्हें छोड़ने का सौदा अस्सी हजार रुपये में तय हो रहा था, लेकिन उसी वक्त हाईवे की वारदात ने बड़ा रूप ले लिया। आनन-फानन में पुलिस ने उन्हें छोड़ने के बजाय एसएसपी के सामने पेश किया और डीजीपी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उन्हें मास्टरमाइंड घोषित कर दिया। बाद में अपनी कहानी को पुख्ता करने के लिए रईस और शाहवेज जैसे और भी निर्दोष नाम इस केस में जोड़ दिए गए। पुलिस की यह 'सक्सेस स्टोरी' दरअसल बेगुनाहों की चीखों पर लिखी गई थी।
संयोग, साजिश और सीबीआई का खुलासा
पुलिस ने अपनी चार्जशीट दाखिल कर दी थी, लेकिन मामला जब सीबीआई के पास पहुँचा तो जाँच की दिशा ही बदल गई। सीबीआई ने पाया कि पुलिस द्वारा पकड़े गए लोगों के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं थे। असली मोड़ 2017 में एक संयोग बनकर आया। हरियाणा की सीआईए टीम ने लूट के एक मामले में नरेश, राका और सागर को गिरफ्तार किया। सलाखों के पीछे इन शातिर अपराधियों ने जब बुलंदशहर की वारदात का पूरा ब्योरा देना शुरू किया, तो सीबीआई को यकीन हो गया कि अब तक बेगुनाह जेल काट रहे थे।
सीबीआई ने इस कबूलनामे को विज्ञान की कसौटी पर परखा। मुख्य आरोपी नरेश के डीएनए का मिलान जब पीड़िता के कपड़ों पर मिले साक्ष्यों से कराया गया, तो वह पूरी तरह मैच कर गया। यह वो क्षण था जब पुलिस का पूरा फर्जीवाड़ा बेनकाब हो गया। जो मुजरिम पुलिस की फाइलों में बंद थे, वे बेगुनाह निकले और जो बाहर घूम रहे थे, वे असली दरिंदे थे।
सिस्टम पर प्रहार और जवाबदेही का सबक
इस 'इनसाइड स्टोरी' का अंत पुलिस विभाग की बड़ी फजीहत के साथ हुआ। तत्कालीन एसएसपी वैभव कृष्ण सहित 19 पुलिसकर्मियों को इस गंभीर लापरवाही और साजिश के लिए निलंबित कर दिया गया। यह केस आज भी इस बात की गवाही देता है कि जब जांच एजेंसियां सच को दबाकर अपनी सुविधा के अनुसार मुजरिम 'पैदा' करती हैं, तो देर-सवेर विज्ञान और संयोग मिलकर उस झूठ का पर्दाफाश कर ही देते हैं।
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