उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में भूमि अधिग्रहण से जुड़ा एक दशक पुराना विवाद अब शासन और प्रशासन के लिए गले की फांस बन गया है। मुरादाबाद स्थित भूमि अर्जन, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन प्राधिकरण (लारा कोर्ट) ने कड़ा रुख अपनाते हुए बिजनौर की जिलाधिकारी जसजीत कौर के सरकारी आवास को कुर्क करने का ऐतिहासिक आदेश जारी किया है। न्यायालय का यह सख्त कदम केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रशासनिक शिथिलता पर न्यायपालिका का करारा प्रहार है। इस फैसले ने न केवल बिजनौर बल्कि पूरे प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।

क्या है पूरा मामला और क्यों आई कुर्की की नौबत

​यह पूरा विवाद बिजनौर में सिंचाई विभाग द्वारा किए गए भूमि अधिग्रहण और उसके बदले दिए जाने वाले मुआवजे से संबंधित है। वर्षों पहले लोकहित की परियोजनाओं के लिए किसानों की भूमि ली गई थी, जिसका उचित मुआवजा मिलना अभी बाकी था। याचिकाकर्ता का आरोप है कि अदालत ने काफी समय पहले ही भुगतान का निर्णय सुना दिया था, लेकिन जिला प्रशासन फाइलों को दबाए बैठा रहा। पीड़ित पक्ष को अपने ही हक के लिए सालों तक दफ्तरों के चक्कर काटने पड़े। जब बार-बार जारी नोटिसों के बाद भी डीएम कार्यालय ने कोई संतोषजनक जवाब या रिपोर्ट पेश नहीं की, तो अदालत ने इसे न्याय प्रक्रिया की अवमानना माना। 'जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड' के सिद्धांत को पुख्ता करते हुए कोर्ट ने डीएम आवास की कुर्की का आदेश देकर स्पष्ट कर दिया कि कानून की नजर में कोई भी पद जवाबदेही से ऊपर नहीं है।

अदालत की सख्त पाबंदियां और डीएम को व्यक्तिगत तलब


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​लारा कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि कुर्की के दौरान जिलाधिकारी अपने सरकारी आवास को न तो किसी अन्य को हस्तांतरित कर सकेंगी और न ही उसका कोई व्यावसायिक उपयोग कर पाएंगी। हालांकि, प्रशासनिक अनिवार्यताओं को देखते हुए उन्हें वहां रहने की अनुमति दी गई है। इसके साथ ही न्यायालय ने डीएम जसजीत कौर को आगामी सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का निर्देश दिया है। यह आदेश प्रशासन की उस कार्यशैली को सीधी चुनौती है जहाँ आम नागरिक की शिकायतों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।

न्यायालय न होते तो क्या मिल पाता पीड़ितों को न्याय

​इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि देश में स्वतंत्र और सशक्त न्यायपालिका न होती, तो क्या इन पीड़ित किसानों को कभी अपना हक मिल पाता? अक्सर देखा जाता है कि जब सत्ता और ऊंचे पदों का रसूख आम आदमी की आवाज को दबाने की कोशिश करता है, तब न्यायालय ही एकमात्र सहारा बचता है। प्रशासनिक तंत्र में व्याप्त 'लालफीताशाही' और जवाबदेही की कमी के कारण एक साधारण किसान के लिए जिलाधिकारी जैसे शक्तिशाली पद से टकराना नामुमकिन सा होता है। अदालत का यह आदेश साबित करता है कि लोकतंत्र में न्याय की चौखट ही वह जगह है, जहाँ एक आम नागरिक और जिले के सबसे बड़े अधिकारी के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है और केवल सत्य की जीत होती है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: जब पहले भी कुर्क हुई डीएम की कुर्सी और गाड़ी

​भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में ऐसे कड़े आदेश दुर्लभ जरूर हैं, लेकिन यह पहली बार नहीं है। उत्तर प्रदेश और बिहार में पहले भी ऐसे दिलचस्प मामले सामने आए हैं जो अफसरों की नींद उड़ा चुके हैं। वर्ष 2017-18 में लखीमपुर खीरी में एक पुराने मामले में भुगतान न होने पर कोर्ट ने डीएम कार्यालय की कुर्सियां, मेज और पंखे तक कुर्क करने के आदेश दिए थे। इसी तरह हापुड़ जिले में भी मुआवजा न देने पर जिलाधिकारी की सरकारी कार को कुर्क करने की नौबत आ गई थी। बिहार के खगड़िया में तो न्यायालय ने डीएम कार्यालय की चल संपत्तियों को कुर्क कर सिस्टम को हिला दिया था। ये उदाहरण गवाह हैं कि जब प्रशासन संवेदनहीन होता है, तब न्यायपालिका को अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना पड़ता है।

विवादों से नाता और लापरवाह अफसरों पर गाज

​2008 बैच की आईएएस अधिकारी जसजीत कौर की छवि आमतौर पर एक कुशल और गंभीर अधिकारी की रही है। बिजनौर से पहले शामली में उनके कार्यकाल की सराहना भी हुई थी। हालांकि, इस वर्तमान प्रकरण ने उनकी प्रशासनिक साख पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। मामले के तूल पकड़ते ही डीएम ने स्पष्टीकरण दिया है कि यह मुआवजा सिंचाई विभाग द्वारा दिया जाना था। उन्होंने अब शासन से बजट की मांग की है और जांच के आदेश दिए हैं कि किस स्तर पर लापरवाही हुई। डीएम का दावा है कि जिन अधिकारियों या कर्मचारियों की वजह से डिमांड भेजने में देरी हुई, उनके खिलाफ कठोर विभागीय कार्रवाई की जाएगी। बिजनौर का यह मामला प्रशासनिक इतिहास में एक बड़ी नजीर के रूप में याद रखा जाएगा।

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