बिलासपुर तहसील क्षेत्र में बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि की मार झेल चुके किसानों का दर्द अब आंसुओं और गुस्से के रूप में बाहर आने लगा है। प्राकृतिक आपदा में अपनी मेहनत गंवा चुके किसानों को उम्मीद थी कि सरकार से मिलने वाली राहत उनके जख्मों पर मरहम लगाएगी, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट निकली। टेमरा गाँव के रहने वाले किसान हरप्रीत सिंह की करीब साढ़े तीन एकड़ (तकरीबन 14 बीघा) जमीन पर लगी धान की फसल पूरी तरह चौपट हो गई थी। महीनों के खून-पसीने और भारी लागत के बाद फसल की बर्बादी ने किसान के सामने रोटी का संकट खड़ा कर दिया।

राज्यमंत्री के आश्वासन के बाद जगी थी आस

​आपदा के तुरंत बाद इलाके के प्रभावित किसानों ने मुआवजे की मांग को लेकर हाईवे तक जाम कर दिया था। उस समय मौके पर पहुंचे प्रशासनिक अफसरों और स्थानीय विधायक व कृषि राज्यमंत्री बलदेव सिंह औलख ने किसानों को पूरा भरोसा दिया था। राज्यमंत्री ने खुद को किसान का बेटा बताते हुए नुकसान का उचित और पूरा मुआवजा दिलाने का बड़ा दावा किया था। इन आश्वासनों के बाद किसानों के मन में आस जगी थी कि कम से कम फसल उगाने में लगी लागत का पैसा तो मिल ही जाएगा, जिससे वे अगली फसल के लिए खेत तैयार कर सकेंगे।

​लेकिन जब प्रशासन द्वारा तय की गई राहत राशि का चेक किसान के हाथों में आया, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। साढ़े तीन एकड़ के भारी नुकसान के बदले सरकार की तरफ से मात्र 3400 रुपये की सहायता राशि दी गई। आज के समय में एक एकड़ फसल तैयार करने में खाद, बीज, जुताई और सिंचाई का खर्च ही कई हजार रुपये बैठता है। ऐसे में प्रति एकड़ एक हजार रुपये से भी कम की मदद मिलना किसान की कमर तोड़ने जैसा है।


Advertisement

​किसान का छलका दर्द

इस उपेक्षा से बेहद आहत होकर किसान हरप्रीत सिंह का दर्द छलक उठा। उन्होंने भारी मन और तंजभरे लहजे में सरकार व स्थानीय प्रशासन से अपील की है कि उनके इस 3400 रुपये के मुआवजे को वापस ले लिया जाए। किसान ने कहा कि यदि सरकार यह रकम वापस ले लेती है तो उनका बहुत धन्यवाद होगा, क्योंकि इतनी कम राशि में तो उनकी लागत का एक छोटा हिस्सा भी पूरा नहीं होता। इस वाकये के बाद पूरे इलाके के किसानों में गहरी नाराजगी है और वे नुकसान का पारदर्शी तरीके से दोबारा सर्वे कराने की माँग उठा रहे हैं।

​क्या कहते हैं मुआवजे के नियम?

​भारत में ओलावृष्टि, बारिश या सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं से फसलों के नुकसान पर मुआवजा राज्य आपदा राहत कोष (SDRF) और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के तहत दिया जाता है। सरकारी आपदा राहत (SDRF) का नियम है कि खेत में कम से कम 33% फसल का नुकसान होना अनिवार्य है, जिसके बाद ही राहत राशि तय की जाती है। इसमें सिंचित फसलों (जैसे धान, गेहूं) के लिए लगभग ₹17,000 प्रति हेक्टेयर (तकरीबन ₹6,800 प्रति एकड़) और सब्जी या नगदी फसलों (जैसे मिर्च, गन्ना) के लिए लगभग ₹22,500 प्रति हेक्टेयर की दर से अनुग्रह राशि दी जाती है, जो अधिकतम 2 हेक्टेयर (लगभग 5 एकड़) की सीमा तक ही सीमित रहती है। वहीं दूसरी ओर, यदि किसान ने फसल बीमा कराया है, तो बेमौसम बारिश या ओलावृष्टि जैसी स्थानीय आपदा के 72 घंटे के भीतर बीमा कंपनी या कृषि विभाग को सूचना देना जरूरी होता है; इसके बाद पटवारी, कृषि अधिकारी और बीमा प्रतिनिधि की संयुक्त टीम मौके पर जाकर वास्तविक नुकसान का आकलन करती है और तय बीमा धन (Sum Insured) के प्रतिशत के हिसाब से मुआवजा जारी किया जाता है। अक्सर जमीनी स्तर पर हल्का लेखपाल या पटवारी पूरे क्षेत्र का औसतन नुकसान दर्ज कर देते हैं, जिससे व्यक्तिगत तौर पर भारी तबाही झेल चुके किसान का सही आकलन नहीं हो पाता और उन्हें नाममात्र का मुआवजा मिलता है।

​क्या हैं विसंगतियां?

​फसल मुआवजे और राहत राशि के वितरण में अक्सर कई गंभीर विसंगतियां देखने को मिलती हैं, जिसके कारण किसानों को भारी तबाही के बावजूद नाममात्र की मदद मिलती है। इसमें सबसे बड़ी समस्या वास्तविक नुकसान के बजाय पूरे क्षेत्र का एक औसत आंकलन करने की है, जिससे व्यक्तिगत रूप से सौ फीसदी फसल खो चुके किसान भी कागजों में कम नुकसान के दायरे में आ जाते हैं। इसके अलावा राज्य आपदा राहत कोष (SDRF) के नियम बहुत सीमित हैं, जिसमें अधिकतम दो हेक्टेयर की सीमा तय है और मिलने वाली राहत राशि फसल उगाने में आई कुल लागत का दसवां हिस्सा भी पूरा नहीं करती। मैदानी स्तर पर सर्वे करने वाली टीमों द्वारा बिना खेत पर जाए या अनुमान के आधार पर रिपोर्ट तैयार करने से भी जरूरतमंद किसानों तक सही मुआवजा नहीं पहुँच पाता, और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में 72 घंटे के भीतर सूचना देने जैसी सख्त शर्तें किसानों के लिए इन प्रक्रियाओं को और अधिक जटिल बना देती हैं।

---समाप्त---