उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक मशीनरी उस समय सन्न रह गई जब बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। यह इस्तीफा केवल एक नौकरी छोड़ने का पत्र नहीं है बल्कि सत्ता के गलियारों में धर्म और नीति के टकराव का जीवंत दस्तावेज बन गया है। अग्निहोत्री ने अपने पत्र में स्पष्ट रूप से शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ हुए दुर्व्यवहार और यूजीसी नियम 2026 के प्रति अपनी गहरी पीड़ा व्यक्त की है। राज्यपाल और चुनाव आयोग को भेजा गया यह इस्तीफा अब एक राजनीतिक हथियार बन चुका है जिसने शासन की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।

शंकराचार्य का हुंकार: अभी तो यह शुरुआत है

​माघ मेले की रेती पर पिछले नौ दिनों से अनशनरत ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने इस इस्तीफे का स्वागत करते हुए इसे धर्म रक्षा की दिशा में एक साहसिक कदम बताया है। गणतंत्र दिवस के अवसर पर तिरंगा फहराने के बाद अपने संकल्प को दोहराते हुए उन्होंने कहा कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो समाज का जागना अनिवार्य हो जाता है। उन्होंने सीधे तौर पर प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा कि पूरे देश का हिंदू समाज अब इस अपमान को सहन नहीं करेगा। उनके अनुसार सिटी मजिस्ट्रेट का यह निर्णय उन तमाम अधिकारियों के लिए एक नजीर है जो अंतरात्मा की आवाज को व्यवस्था की बेड़ियों से ऊपर रखते हैं।

धार्मिक अपमान पर सियासी महाभारत का सूत्रपात


Advertisement

​इस विवाद ने उत्तर प्रदेश की सियासत को दो फाड़ कर दिया है। जहाँ एक तरफ मुख्यमंत्री की चुप्पी को विपक्ष ने ढाल बना लिया है वहीं उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के अनुनय-विनय को शंकराचार्य के समर्थकों ने देर से उठाया गया कदम बताया है। विपक्ष ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लेते हुए इसे संत समाज का अपमान करार दिया है। आलम यह है कि सत्ता पक्ष के भीतर भी अब इस मुद्दे पर एक राय नहीं बन पा रही है। सिटी मजिस्ट्रेट के इस्तीफे की खबर ने धरने पर बैठे साधु-संतों में नया जोश भर दिया है और अब यह आंदोलन प्रयागराज की सीमाओं को लांघकर पूरे प्रदेश में फैलने की ओर अग्रसर है।

साजिश और अपमान के बीच डटा धर्म ध्वज

​शंकराचार्य ने स्पष्ट आरोप लगाया है कि प्रशासन न केवल उनकी मांगों की अनदेखी कर रहा है बल्कि उन्हें और उनके शिष्यों को बदनाम करने की गहरी साजिश भी रची जा रही है। मौनी अमावस्या के दिन हुई बर्बरता की यादें अभी ताजा हैं और उस पर से सिटी मजिस्ट्रेट का यह अप्रत्याशित त्यागपत्र आग में घी डालने का काम कर रहा है। प्रशासन द्वारा उन्हें अपमानित करने के प्रयासों के बीच अलंकार अग्निहोत्री जैसे अधिकारी का सामने आना यह दर्शाता है कि विवाद अब केवल टेंट और जमीन का नहीं रहा बल्कि यह सिद्धांतों और अस्मिता की लड़ाई बन चुका है। आने वाले दिनों में यह विद्रोह सरकार के लिए बड़ी चुनौती पेश कर सकता है।

---समाप्त---