इंटरनेट डेस्क। बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय की सुरक्षा को लेकर उठ रहे सवाल एक बार फिर गहरे हो गए हैं। जशोर जिले के मनीरामपुर में हुई एक बर्बर घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। सोमवार की शाम करीब छह बजे जब लोग अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त थे, तब कोपलिया बाजार इलाका गोलियों की तड़तड़ाहट से गूँज उठा। यहाँ के स्थानीय पत्रकार और व्यवसायी राणा प्रताप को अपराधियों ने बेहद ठंडे दिमाग से मौत के घाट उतार दिया। यह घटना केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं है, बल्कि यह उस असुरक्षा की भावना का प्रतीक है जिससे वर्तमान में बांग्लादेश का अल्पसंख्यक समाज जूझ रहा है।
साजिश के तहत बुलावा और फिर कत्ल प्रत्यक्षदर्शियों से प्राप्त जानकारी के अनुसार यह एक सुनियोजित हत्या थी। हमलावर मोटरसाइकिल पर सवार होकर आए थे और सीधे राणा प्रताप की बर्फ की फैक्ट्री पर पहुँचे। उन्होंने राणा को किसी बहाने से फैक्ट्री से बाहर बुलाया। बिना किसी आशंका के राणा उनके साथ पास ही स्थित एक क्लिनिक वाली गली तक चले गए। वहां हमलावरों और राणा के बीच कुछ देर तक तीखी बहस हुई। चश्मदीदों का कहना है कि बहस के दौरान ही अचानक हमलावरों ने हथियार निकाल लिए। इससे पहले कि राणा खुद को बचा पाते या आसपास के लोग हस्तक्षेप करते, हमलावरों ने उनके सिर को निशाना बनाकर कई राउंड फायरिंग कर दी। गोलियां लगने के बाद राणा वहीं लहूलुहान होकर गिर पड़े और हमलावरों ने सुनिश्चित किया कि उनकी जान जा चुकी है।
कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल इस वारदात को अंजाम देने के बाद अपराधी बड़ी आसानी से मनीरामपुर की ओर जाने वाली मुख्य सड़क से फरार हो गए। स्थानीय प्रशासन की सक्रियता पर सवाल उठाते हुए मनोहरपुर यूनियन परिषद के अध्यक्ष अख्तर फारुक मिंटू ने घटना की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि जिस तरह से अपराधियों ने सरेआम इस हत्याकांड को अंजाम दिया है, वह कानून व्यवस्था की बदहाली को दर्शाता है। एक पत्रकार की इस तरह हत्या किया जाना प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी पर भी करारा प्रहार है। घटना के बाद से पूरे इलाके में तनाव का माहौल है और हिंदू समुदाय के लोग अपनी सुरक्षा को लेकर अत्यंत चिंतित हैं।
न्याय की गुहार और बढ़ता आक्रोश राणा प्रताप की हत्या के बाद स्थानीय लोगों में जबरदस्त गुस्सा देखा जा रहा है। लोगों का कहना है कि अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाली ताकतों को राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है, जिसके कारण उनके हौसले बुलंद हैं। पुलिस ने मौके पर पहुँचकर जांच शुरू कर दी है, लेकिन अब तक किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी न होना प्रशासन की विफलता माना जा रहा है। यह दुखद मामला एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान बांग्लादेश में मानवाधिकारों के उल्लंघन और अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों की ओर खींचता है। क्या प्रशासन इन हत्यारों को पकड़ पाएगा या राणा प्रताप का मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा, यह एक बड़ा प्रश्न बना हुआ है।
---समाप्त---