इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण कानूनी हस्तक्षेप करते हुए भवन और अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण उपकर अधिनियम के तहत किए गए टैक्स निर्धारण पर सवाल उठाए हैं। यह मामला मैसर्स वाटिका रिसॉर्ट एंड होटल द्वारा दायर किया गया था, जिसमें अपर श्रम आयुक्त, रामपुर के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें निर्माण लागत की गणना के लिए एक विशेष मल्टीप्लायर का उपयोग किया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि विभाग ने वास्तविक निर्माण क्षेत्र को स्वीकार तो कर लिया, लेकिन टैक्स की राशि को बढ़ाने के लिए लागत के मानदंडों को बिना किसी ठोस आधार के पांच गुना तक बढ़ा दिया। इस विसंगति को देखते हुए न्यायालय ने मामले की गहन समीक्षा करने का निर्णय लिया है।

लागत निर्धारण की प्रक्रिया पर कानूनी सवाल

​न्यायालय के समक्ष सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि प्रारंभ में विभाग ने 8000 वर्ग मीटर क्षेत्र पर निर्माण मानते हुए नोटिस जारी किया था। हालांकि, बाद में विभाग ने खुद स्वीकार किया कि वास्तविक निर्माण केवल 2817.70 वर्ग मीटर पर ही हो रहा है। इसके बावजूद, विभाग ने लोक निर्माण विभाग की पुरानी दरों का हवाला देते हुए 20,600 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से लागत का आकलन कर दिया। याचिकाकर्ता के वकील ने न्यायालय को बताया कि यह गणना किसी भी प्रमाणित सरकारी दस्तावेज या शेड्यूल ऑफ रेट्स से मेल नहीं खाती है। कोर्ट ने इस दलील में दम पाया कि जब निर्माण क्षेत्र कम हुआ, तो लागत की दर में अचानक इतनी वृद्धि करने का कोई स्पष्ट कारण अंतिम आदेश में नहीं दिया गया था।

हाईकोर्ट का अंतरिम आदेश और भविष्य की दिशा


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​न्यायमूर्ति अरुण कुमार की पीठ ने इस मामले में राज्य सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है। अदालत ने अंतरिम राहत देते हुए निर्देश दिया है कि यदि याचिकाकर्ता अपनी स्वीकार्य राशि जो कि 1,25,000 रुपये है, उसे एक महीने के भीतर जमा कर देता है, तो उसके खिलाफ कोई भी दंडात्मक या दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पहले से जमा की गई किसी भी राशि को इस निर्धारण में समायोजित किया जाएगा। यह आदेश उन सभी निर्माणकर्ताओं के लिए एक बड़ी राहत माना जा रहा है जो विभाग द्वारा मनमाने ढंग से तय की गई निर्माण लागत की समस्या से जूझ रहे हैं।

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