डिजिटल इंडिया को बढ़ावा देने के सरकारी दावों के बीच एक तस्वीर ने जमीनी हकीकत को उजागर कर दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही एक दुकान की सूची में चीनी का रेट भुगतान के तरीके के आधार पर अलग तय किया गया है। जहां कैश में चीनी 60 रुपये प्रति किलो है, वहीं UPI पर 61 रुपये और कार्ड से भुगतान करने पर 62 रुपये लिखे गए हैं। हालांकि नियम यह कहते हैं कि डिजिटल भुगतान पर लगने वाले मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) या चार्जेस का भुगतान दुकानदारों को करना होता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह अप्रत्यक्ष बोझ अंततः ग्राहक की ही जेब पर आ रहा है। यह वायरल फोटो इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि नियम चाहे जो भी हों, धरातल पर उसकी कीमत आम जनता चुका रही है।

​अप्रत्यक्ष बोझ की असल वजह

​सरकार और डिजिटल पेमेंट कंपनियों द्वारा 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन, क्रेडिट कार्ड या प्रीपेड वॉलेट भुगतानों पर जो शुल्क तय किए जाते हैं, उनका मकसद बैंकिंग और पेमेंट सिस्टम को आर्थिक रूप से बनाए रखना होता है। लेकिन रिटेल बिजनेस में मुनाफा बहुत सीमित होता है। जब किसी छोटे या मध्यम स्तर के व्यापारी को डिजिटल लेनदेन पर शुल्क या बैंक चार्जेस देने पड़ते हैं, तो वह उस अतिरिक्त लागत को खुद वहन करने के बजाय उत्पाद की कीमत में जोड़ देता है। चीनी जैसी रोजमर्रा की वस्तुओं पर प्रति किलो 1 से 2 रुपये का यह अंतर सीधे तौर पर उपभोक्ता से ही वसूला जा रहा है, जिससे कैश पेमेंट फिर से अधिक आकर्षक लगने लगा है।

​MDR पर 18% GST का गणित


Advertisement

​डिजिटल लेनदेन से जुड़ी चिंताओं को और बढ़ाने वाली बात यह है कि व्यापारियों पर लगने वाले MDR शुल्क पर 18 प्रतिशत की दर से GST भी लागू होता है। नियमों के तहत बड़े मर्चेंट ट्रांजेक्शन (0.40% MDR) पर अधिकतम 300 रुपये की कैपिंग (सीमा) तय की गई है। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई ग्राहक किसी व्यापारी को ₹75,000 या उससे अधिक का UPI पेमेंट करता है, तो तय सीमा के अनुसार उस पर बेस MDR 300 रुपये बनता है। लेकिन बैंक या पेमेंट गेटवे द्वारा जब इस सर्विस पर 18% GST (54 रुपये) जोड़ा जाता है, तो दुकानदार के लिए कुल लागत बढ़कर सीधे 354 रुपये हो जाती है। हालांकि, GST रजिस्टर्ड व्यापारी इस 18% GST पर 'इनपुट टैक्स क्रेडिट' (ITC) का दावा कर सकते हैं, लेकिन छोटे और बिना GST रजिस्ट्रेशन वाले व्यापारियों के लिए यह ₹354 का पूरा खर्च एक सीधा वित्तीय घाटा बन जाता है, जिसे वे ग्राहकों के बिल में जोड़कर वसूलने का रास्ता अपनाते हैं।

​नियम बनाम धरातल की हकीकत

​उपभोक्ता मामलों के विशेषज्ञों और नियमों के मुताबिक व्यापारी अपने मर्चेंट चार्जेस का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल सकते और न ही डिजिटल भुगतान के लिए अधिक रेट वसूल सकते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि निगरानी तंत्र हर छोटी-बड़ी दुकान तक नहीं पहुंच पाता। जब दुकानदार यह देखते हैं कि ऑनलाइन पेमेंट से उनके मुनाफे का हिस्सा कट रहा है, तो वे सीधे तौर पर दरें बढ़ाकर या कैश पर छूट देकर अपना बचाव करते हैं। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा नुकसान उस आम उपभोक्ता को होता है जो पारदर्शी और पारम्परिक डिजिटल लेनदेन पर भरोसा करके कैशलेस पेमेंट की ओर बढ़ा था।

​कैशलेस अर्थव्यवस्था पर सवालिया निशान

​डिजिटल भुगतान पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ रहे इस वित्तीय दबाव से नकद रहित अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी हो सकती है। अगर हर सामान पर डिजिटल पेमेंट करने पर extra चार्ज लगेगा, तो आम ग्राहक दोबारा कैश का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर होगा। वायरल फोटो में दिख रहा 'चीनी RATE' का यह बोर्ड केवल एक दुकान का मामला नहीं है, बल्कि यह उन व्यावहारिक खामियों की ओर इशारा करता है जिन्हें सुलझाए बिना डिजिटल इंडिया का सपना आम आदमी के लिए महंगा साबित हो सकता है।

---समाप्त---