उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक ऐसी स्थिति बन गई है जिसे देखकर राजनीतिक पंडित भी हैरान हैं। प्रयागराज के माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ हुई पुलिसिया धक्का-मुक्की का मामला अब केवल प्रशासनिक चूक नहीं रहा, बल्कि यह भाजपा के भीतर के सबसे बड़े अंतर्विरोध को सतह पर ले आया है। इस पूरे विवाद ने सत्ता और संगठन के बीच की उस दरार को सार्वजनिक कर दिया है, जिसे अब तक ढंकने की कोशिश की जा रही थी। सवाल अब यह उठ रहा है कि क्या अपनी ही सरकार में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मुद्दे पर अकेले पड़ गए हैं? उनके मंत्रियों और संगठन के पदाधिकारियों के सुर जिस तरह मुख्यमंत्री के स्टैंड से अलग सुनाई दे रहे हैं, वह आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के लिए खतरे की घंटी है।

योगी का 'कालनेमि' प्रहार और मर्यादा की लक्ष्मण रेखा

​मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मामले में अपने चिर-परिचित सख्त अंदाज में नजर आ रहे हैं। उन्होंने बिना नाम लिए एक ऐसा प्रहार किया जिसने पूरे संत समाज और राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी। योगी ने कहा कि किसी को भी सनातन परंपरा बाधित करने का हक नहीं है। उन्होंने रामायण के प्रसंग का जिक्र करते हुए चेतावनी दी कि समाज में आज भी कई 'कालनेमि' सक्रिय हैं, जो धर्म का चोला पहनकर सनातन को कमजोर करने की साजिश रच रहे हैं। यहाँ समझना जरूरी है कि कालनेमि वह मायावी राक्षस था जिसने हनुमान को रोकने का प्रयास किया था। योगी का यह बयान साफ करता है कि वे अविमुक्तेश्वरानंद के विरोध को महज एक प्रशासनिक शिकायत नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश के तौर पर देख रहे हैं। उनके लिए संन्यासी का धर्म राष्ट्र सेवा है, न कि विवादों को हवा देना।

केशव मौर्य का दंडवत और संगठन की चुनावी व्याकुलता


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​एक तरफ जहाँ मुख्यमंत्री का रुख चट्टान की तरह सख्त है, वहीं उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का नजरिया पूरी तरह विपरीत दिखाई देता है। आजमगढ़ पहुंचे केशव मौर्य ने जिस तरह से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के चरणों में प्रणाम किया और विनम्रतापूर्वक उनसे विवाद खत्म करने की प्रार्थना की, उसने सबको चौंका दिया। केशव मौर्य और प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की यह 'सॉफ्ट डिप्लोमेसी' दरअसल 2027 के डर से उपजी है। इन नेताओं को बखूबी एहसास है कि अगर पार्टी संतों के खिलाफ खड़ी नजर आई, तो इसका सीधा नुकसान उनके कोर वोट बैंक को होगा। संगठन को डर है कि कहीं यह विवाद विपक्षी दलों के लिए संजीवनी न बन जाए, इसलिए वे योगी के 'हार्ड स्टैंड' के बजाय सुलह के रास्ते पर चलना ज्यादा सुरक्षित समझ रहे हैं।

प्रशासन का कानूनी दांव और संतों का आक्रोश

​मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब प्रयागराज मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उनकी पदवी को लेकर नोटिस जारी कर दिया। प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने आदेश का हवाला देते हुए सवाल किया कि उन्होंने खुद को शंकराचार्य कैसे घोषित कर लिया। इस कानूनी नोटिस ने आग में घी डालने का काम किया है। गोवर्धनमठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने भी इस पर गहरी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने अविमुक्तेश्वरानंद को अपना लाडला बताते हुए साफ कहा कि किसी भी साधु-संत के साथ मारपीट या ब्रह्मचारियों की चोटियां पकड़कर खींचना बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वहीं कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने भी इसे बड़ा धर्म संकट बताते हुए कहा कि तिलक और भगवा पहनने वालों का अपमान नहीं होना चाहिए।

खून से लिखी चिट्ठी और भविष्य की डरावनी तस्वीर

​विवाद की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि केस के मुख्य याचिकाकर्ता दिनेश फलाहारी महाराज ने अपने खून से मुख्यमंत्री योगी को पत्र लिख दिया है। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि प्रधानमंत्री मोदी भी जिन संतों के पैर छूते हैं, उनका अपमान अधिकारियों द्वारा किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने योगी को आगाह किया कि संतों के इस जुबानी युद्ध का सीधा फायदा विपक्षी दल उठा रहे हैं। फिलहाल भाजपा एक ऐसी दोधारी तलवार पर खड़ी है जहाँ एक तरफ मुख्यमंत्री का इकबाल है और दूसरी तरफ करोड़ों हिंदुओं की आस्था। यदि पार्टी झुकती है तो योगी की सख्त छवि पर आंच आती है और यदि विवाद बढ़ता है तो वोट बैंक के खिसकने का खतरा साफ नजर आ रहा है। यह आपसी मतभेद आने वाले दिनों में यूपी की सियासत का रुख तय करेंगे।

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