भारत की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर, जो अक्सर देश की लोकतांत्रिक आवाजों का गवाह बनता है, वहां हाल ही में एक ऐसी तस्वीर उभरी जिसने न्याय व्यवस्था की नैतिकता पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ उत्तर प्रदेश की राजनीति का पूर्व बाहुबली चेहरा और बलात्कार का दोषी कुलदीप सिंह सेंगर अपनी बेटी की शादी की तैयारियों के लिए जेल की सलाखों से बाहर आ रहा है, तो दूसरी तरफ उसी का दंश झेल रही पीड़िता को दिल्ली पुलिस प्रदर्शन स्थल से जबरन घसीटकर हटा रही है। यह विरोधाभास केवल एक कानूनी प्रक्रिया भर नहीं है, बल्कि उस लंबी और थका देने वाली लड़ाई का एक ऐसा दुखद पड़ाव है, जिसे उन्नाव बलात्कार मामले के रूप में पूरी दुनिया ने देखा है।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने कुलदीप सिंह सेंगर को उसकी बेटी की शादी में शामिल होने के लिए अंतरिम जमानत मंजूर की है। कानून के जानकार मानते हैं कि सजायाफ्ता कैदियों को मानवीय आधार पर ऐसी राहतें मिलती रही हैं, लेकिन इस मामले की पृष्ठभूमि इसे साधारण से अलग बनाती है। जानकारों का तर्क है कि जब अपराधी का इतिहास गवाहों को डराने, जेल के भीतर से तंत्र को प्रभावित करने और सड़क हादसों के जरिए परिवार को खत्म करने की कोशिश करने का रहा हो, तो ऐसी मानवीय राहत पीड़िता के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। पीड़िता का आरोप है कि सेंगर का रसूख आज भी जेल की दीवारों के पार उतना ही प्रभावी है जितना पहले था। जंतर-मंतर पर भारी पुलिस बल के बीच पीड़िता ने रुंधे गले से व्यवस्था पर प्रहार करते हुए कहा,
"एक तरफ जघन्य अपराध का दोषी बेटी की शादी के नाम पर रिहा हो रहा है, और दूसरी तरफ इंसाफ मांग रही पीड़िता को पुलिस बलपूर्वक उठा रही है। हमें आज भी धमकियां मिलती हैं। जब वह जेल में था, तब भी हम सुरक्षित नहीं थे, अब उसके बाहर आने के बाद हमारी सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा? प्रशासन हमें सुरक्षा देने के बजाय हमें ही वहां से हटा रहा है जहां हम अपनी बात रख सकते हैं।"
इस पूरे घटनाक्रम ने देश के उन तमाम लोगों को झकझोर दिया है जो न्याय के लिए लड़ रहे हैं। निर्भया की माँ आशा देवी, जिन्होंने खुद कानूनी गलियारों की जटिलताओं को सालों तक झेला है, ने इस फैसले को न्याय व्यवस्था पर एक कड़ा प्रहार बताया है। उन्होंने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि कोर्ट खुद ही न्याय का मज़ाक बना रहा है। आशा देवी के अनुसार, यह कोई साधारण चोरी या छोटे अपराध का मामला नहीं है, बल्कि एक जघन्य कृत्य है। एक अपराधी को सजा इसलिए दी जाती है ताकि समाज में एक सख्त संदेश जाए और पीड़ितों को सुरक्षा का अहसास हो। लेकिन जब रसूखदार दोषियों को बार-बार ऐसी राहतें दी जाती हैं, तो यह न केवल पीड़ितों का हौसला तोड़ती हैं बल्कि न्यायपालिका के इकबाल पर भी सवाल खड़ा करती हैं। उनका मानना है कि अपराधी चाहे घर पर हो या जेल से सैकड़ों किलोमीटर दूर, उसके अपराध की गंभीरता कम नहीं होती और न ही पीड़ित का डर कम होता है।
इस पूरे विश्लेषण में यह समझना जरूरी है कि कुलदीप सेंगर का मामला कभी भी केवल एक आपराधिक मुकदमा नहीं रहा। यह सत्ता, बाहुबल और एक आम नागरिक के बीच के उस असमान संघर्ष की कहानी है जिसमें सिस्टम अक्सर ताकतवर के पक्ष में झुका हुआ नजर आया। पीड़िता के पिता की पुलिस हिरासत में हुई बर्बर मौत से लेकर, रायबरेली में हुआ वह संदिग्ध सड़क हादसा जिसमें पीड़िता की चाची और मौसी की जान चली गई, हर मोड़ पर रसूख की छाया दिखाई दी। इन घटनाओं के बावजूद जब आज प्रशासन पीड़िता को सुरक्षा का आश्वासन देने के बजाय उसकी आवाज दबाने की कोशिश करता है, तो व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजिमी है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और महिला अधिकार समूहों का तर्क है कि जंतर-मंतर पर जिस तरह पुलिस ने पीड़िता के साथ व्यवहार किया, वह लोकतांत्रिक मूल्यों के पूरी तरह खिलाफ है। यह प्रशासनिक रवैया स्पष्ट करता है कि तंत्र आज भी ताकतवर के प्रति नरम और कमजोर के प्रति कठोर बना हुआ है।
फिलहाल कुलदीप सिंह सेंगर अंतरिम जमानत पर बाहर है और पीड़िता एक बार फिर अपनी और अपने बचे हुए परिवार की जिंदगी के लिए उसी खौफ के साये में जीने को मजबूर है जिससे लड़कर उसने अपराधी को सलाखों के पीछे पहुँचाया था। यह मामला भारतीय न्यायपालिका के सामने एक बड़ी और नैतिक चुनौती पेश करता है कि क्या व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा के नाम पर दी जाने वाली राहत, पीड़ित की सुरक्षा और न्याय की मूल भावना से ऊपर हो सकती है। सड़कों पर मची यह हलचल और अदालती गलियारों के यह फैसले आने वाले समय में न्याय की परिभाषा को नए सिरे से तय करेंगे।
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