देश की सबसे बड़ी अदालत में गुरुवार को लद्दाख के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की व्यक्तिगत आजादी को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी लड़ाई लड़ी गई। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना वराले की बेंच के सामने उनकी पत्नी डॉ. गीतांजलि अंगमो द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत वांगचुक की गिरफ्तारी को चुनौती दी गई है। सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने मामले की शुरुआत करते हुए सीधे तौर पर केंद्र सरकार और लद्दाख प्रशासन की नीयत पर प्रहार किया। उन्होंने दलील दी कि 26 सितंबर 2025 को जारी किया गया हिरासत आदेश कानूनी और संवैधानिक दोनों मोर्चों पर पूरी तरह विफल है। सिब्बल ने कोर्ट को बताया कि कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को हिरासत में रखने से पहले उसे उन सभी दस्तावेजों को देखने का अधिकार है जिनके आधार पर उसे पकड़ा गया है, लेकिन वांगचुक के मामले में इस बुनियादी अधिकार का खुलेआम उल्लंघन किया गया है।

लापता सबूत और कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन

सुनवाई के दौरान सिब्बल ने कोर्ट का ध्यान उन तकनीकी और प्रक्रियात्मक खामियों की ओर खींचा जो इस पूरे मामले को संदिग्ध बनाती हैं। हिरासत का आधार मुख्य रूप से चार वीडियो को बनाया गया था, लेकिन जब 29 सितंबर को वांगचुक को हिरासत के कारण बताए गए, तो वे वीडियो गायब थे। सिब्बल ने जोर देकर कहा कि केवल वीडियो के लिंक दे देना पर्याप्त नहीं है, खासकर तब जब हिरासत में मौजूद व्यक्ति के पास इंटरनेट या संसाधनों की पहुंच न हो। उन्होंने बताया कि वांगचुक ने बार-बार प्रशासन को पत्र लिखकर इन वीडियो की मांग की ताकि वे अपनी बेगुनाही साबित कर सकें, लेकिन प्रशासन ने जानबूझकर देरी की। सिब्बल के अनुसार, कानून की नजर में यदि हिरासत में रखे गए व्यक्ति को निर्भर सामग्री नहीं दी जाती, तो अनुच्छेद 22 के तहत मिलने वाला प्रभावी प्रतिनिधित्व का अधिकार समाप्त हो जाता है और ऐसी हिरासत को तुरंत रद्द कर दिया जाना चाहिए।

अदालत में वीडियो के जरिए हिंसा के दावों की हवा निकली

इस सुनवाई का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब सर्वोच्च अदालत की अनुमति से कपिल सिब्बल ने वह वीडियो खुली अदालत में चलाया, जिसे प्रशासन ने हिंसा भड़काने वाला साक्ष्य माना था। वीडियो के दृश्य सरकारी दावों के बिल्कुल उलट कहानी पेश कर रहे थे। वीडियो में वांगचुक उसी स्थान पर खड़े होकर लोगों से शांति बनाए रखने और किसी भी प्रकार की हिंसा न करने की भावुक अपील करते नजर आए। सिब्बल ने तर्क दिया कि जो व्यक्ति अहिंसा और लोकतांत्रिक मूल्यों की बात कर रहा है, उसे प्रशासन ने एक खतरनाक अपराधी की तरह पेश किया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन ने जानबूझकर वांगचुक के शांतिपूर्ण संदेशों को रिकॉर्ड से गायब कर दिया ताकि निरोधक प्राधिकरण को भ्रमित किया जा सके। कोर्ट को बताया गया कि यह न केवल तथ्यों को तोड़ना-मरोड़ना है, बल्कि एक शांतिप्रिय नागरिक की आवाज को दबाने का प्रयास है।

लद्दाख की मांगों को दबाने के लिए सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल

सिब्बल ने अदालत के समक्ष यह पक्ष भी रखा कि वांगचुक के खिलाफ यह कार्रवाई किसी कानून-व्यवस्था की समस्या का नतीजा नहीं, बल्कि एक बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक घेराबंदी का हिस्सा है। उन्होंने पिछले कुछ महीनों के घटनाक्रम का विवरण देते हुए बताया कि कैसे वांगचुक और उनके संस्थानों को निशाना बनाया जा रहा है। सीबीआई की जांच, आयकर विभाग के नोटिस और भूमि लीज को रद्द करना जैसे कदम यह दर्शाते हैं कि राज्य की मशीनरी का इस्तेमाल लद्दाख की जायज मांगों को कुचलने के लिए किया गया। सिब्बल ने स्पष्ट किया कि वांगचुक का आंदोलन केवल लद्दाख के भविष्य और वहां के शासन ढांचे में सुधार के लिए है। हिरासत के आधारों को सलाहकार बोर्ड के सामने रखने में की गई देरी और साक्ष्यों को छिपाने की रणनीति ने प्रशासन की निष्पक्षता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। अब इस मामले की अगली सुनवाई सोमवार को होगी, जहां कोर्ट यह तय करेगा कि क्या एक नागरिक की स्वतंत्रता को इन आधारों पर छीना जा सकता है।


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