प्रयागराज की पावन त्रिवेणी के तट पर इस बार भक्ति की धारा के साथ-साथ आक्रोश की लहर भी देखने को मिली। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने भारी मन और गंभीर आरोपों के साथ माघ मेले का त्याग कर दिया है। संगम की रेती पर दस दिनों तक चले धरने के बाद काशी के लिए प्रस्थान करते समय शंकराचार्य के तेवर बेहद तल्ख नजर आए। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे किसी भी प्रकार के सरकारी लालच या सुविधाओं के बदले अपने शिष्यों के स्वाभिमान और सनातन की मर्यादा से समझौता नहीं करेंगे। यह विवाद महज एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सत्ता और धर्म के बीच की एक गहरी खाई के रूप में उभरकर सामने आया है।

प्रशासनिक प्रस्तावों को बताया धोखे का जाल

प्रस्थान से पूर्व प्रशासन ने शंकराचार्य को मनाने की जो अंतिम कोशिश की, उसने आग में घी डालने का काम किया। अधिकारियों द्वारा रखे गए प्रस्तावों को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने पूरी तरह खारिज करते हुए इन्हें 'लालच का जाल' करार दिया। उनका कहना था कि प्रशासन अपनी गलतियों पर पर्दा डालने के लिए अब पालकी यात्रा और विशेष सुविधाओं का प्रलोभन दे रहा है। शंकराचार्य ने तर्क दिया कि यदि पालकी से संगम स्नान की अनुमति अब दी जा सकती है, तो मौनी अमावस्या के दिन इसे क्यों रोका गया? उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार बटुक शिष्यों के साथ हुई अभद्रता और मारपीट पर माफी मांगने के बजाय भौतिक सुख-सुविधाओं के जरिए मामले को दबाना चाहती है, जिसे वे कभी स्वीकार नहीं करेंगे।

शिष्यों के स्वाभिमान और अपमान की लड़ाई

विवाद की जड़ उस घटना में है जब मौनी अमावस्या के पावन पर्व पर शंकराचार्य की पालकी को संगम जाने से रोक दिया गया था। उस दौरान बटुक शिष्यों के साथ कथित दुर्व्यवहार ने शंकराचार्य को विचलित कर दिया। उन्होंने कहा कि एक संत के लिए उसके शिष्यों का सम्मान सर्वोपरि है। प्रशासन की 'अकड़' पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि वे सरकारी 'रेवड़ियां' बांटने वाली व्यवस्था के सामने नतमस्तक नहीं होंगे। शंकराचार्य के अनुसार, अपमान सहकर सुविधाएं भोगना उनकी अंतरात्मा की आवाज के खिलाफ है। यही कारण रहा कि उन्होंने प्रयागराज में रुककर अपनी गरिमा को और अधिक ठेस पहुँचाने के बजाय वहां से जाने का निर्णय लिया।

धर्म की अदालत में जनता करेगी फैसला

योगी सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए शंकराचार्य ने इसे अपने जीवन का सबसे बड़ा दुख बताया है। उन्होंने राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि सनातन धर्म को लगी इस चोट की भरपाई करना आसान नहीं होगा। जीत और हार के दावों के बीच उन्होंने पूरी स्थिति को जनता की अदालत में सौंप दिया है। उनके अनुसार, असली फैसला सनातनी जनता करेगी कि कौन सही था और कौन गलत। प्रयागराज से काशी तक का यह सफर उत्तर प्रदेश की धार्मिक राजनीति में एक नया मोड़ लेकर आया है, जिसके भविष्य में गहरे परिणाम देखने को मिल सकते हैं।


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