उत्तर प्रदेश के चर्चित मोहम्मद अख़लाक मॉब लिंचिंग मामले में ग्रेटर नोएडा की एक स्थानीय अदालत ने बेहद महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है जिसमें सभी अभियुक्तों के विरुद्ध दर्ज मुकदमों को वापस लेने की अनुमति मांगी गई थी। इस आदेश के बाद अब 2015 के इस संवेदनशील मामले में सभी 18 अभियुक्तों को अदालती कार्यवाही का सामना करना होगा। कोर्ट के इस कड़े रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि गंभीर आपराधिक मामलों में न्याय प्रक्रिया का पालन होना अनिवार्य है और इसमें किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं किया जाएगा।

​सरकार की अर्जी और कोर्ट का कड़ा रुख

​उत्तर प्रदेश सरकार ने अदालत में एक प्रार्थना पत्र दाखिल किया था। इस अर्जी में जनहित और न्याय व्यवस्था का हवाला देते हुए अभियुक्तों पर लगे आरोपों को वापस लेने की इच्छा जताई गई थी। हालांकि पीड़ित परिवार के वकील मोहम्मद यूसुफ़ सैफ़ी ने इस अर्जी का पुरजोर विरोध किया और इसे तथ्यों से परे बताया। मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायाधीश ने सरकारी पक्ष की दलीलों को बेबुनियाद करार दिया। अदालत ने न केवल सरकार की मांग को ठुकराया बल्कि यह भी निर्देश दिया कि इस मामले की सुनवाई अब रोजाना आधार पर की जाए ताकि न्याय मिलने में और अधिक विलंब न हो। कोर्ट के इस रुख से साफ़ है कि कानून की नज़र में अपराध की गंभीरता सर्वोपरि है।

​घटना का इतिहास और वर्तमान कानूनी स्थिति

​यह पूरा मामला 28 सितंबर 2015 की रात का है जब दादरी के बिसाहड़ा गांव में एक उग्र भीड़ ने मोहम्मद अख़लाक के घर पर धावा बोल दिया था। उस समय भीड़ का आरोप था कि अख़लाक के परिवार ने अपने घर में गोमांस रखा है। इस हिंसक हमले में मोहम्मद अख़लाक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी और उनके बेटे दानिश को गंभीर रूप से घायल कर दिया गया था। इस घटना ने उस समय पूरे देश का ध्यान खींचा था और धार्मिक सहिष्णुता पर एक बड़ी बहस छेड़ दी थी।

​वर्तमान में इस मामले में ट्रायल जारी है और अब तक एक महत्वपूर्ण गवाह से पूछताछ पूरी हो चुकी है। कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए 6 जनवरी की तारीख तय की है। पीड़ित पक्ष के वकीलों का कहना है कि वे पिछले कई सालों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं और सरकार की इस अर्जी के खारिज होने से उनकी उम्मीदें फिर से जाग गई हैं। अब इस केस की कार्यवाही बिना किसी रुकावट के तेज गति से आगे बढ़ने की संभावना है। कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ा संदेश है जो कानून को अपने हाथ में लेने की कोशिश करते हैं।


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