लखनऊ का पॉश इलाका आशियाना उस वक्त दहल गया जब एक प्रतिष्ठित कारोबारी के घर के भीतर से बदबू उठने लगी। यह बदबू किसी कचरे की नहीं, बल्कि एक ऐसे पिता के शव की थी जिसे उसके अपने ही खून ने मौत के घाट उतार दिया था। मानवेंद्र सिंह, जो शहर के बड़े पैथोलॉजी और शराब व्यवसायी थे, उन्हें क्या पता था कि जिस बेटे के भविष्य के लिए वह दिन-रात सख्ती बरत रहे थे, वही उनकी जान का दुश्मन बन बैठा है। 20 फरवरी की वह सुबह शहर के लिए एक सामान्य सुबह थी, लेकिन सेक्टर एल-91 के उस मकान में कत्ल की एक ऐसी पटकथा लिखी जा चुकी थी जिसे सुनकर पुलिस अधिकारियों के भी पैर कांप गए। अक्षत प्रताप सिंह उर्फ राजा ने न केवल अपने पिता के सिर में गोली मारी, बल्कि रिश्तों की हर मर्यादा को तार-तार करते हुए शव के टुकड़े कर उसे नीले ड्रम में भर दिया।
चोरी की वह घटना जिसने बोए नफरत के बीज
इस हत्याकांड की जड़ें चार महीने पुरानी एक घटना में छिपी थीं। घर से कीमती जेवर गायब हुए थे और शक की सुई नौकरानी पर गई। पुलिस तक मामला पहुँचा, लेकिन जब मानवेंद्र को पता चला कि चोर कोई बाहर का नहीं बल्कि उनका अपना बेटा अक्षत है, तो उन्होंने बदनामी के डर से पैर पीछे खींच लिए। पिता ने केस तो वापस ले लिया लेकिन बेटे पर पहरा सख्त कर दिया। यह सख्ती अक्षत को चुभने लगी थी। ला मार्टिनियर जैसे प्रतिष्ठित स्कूल से पढ़ने वाला अक्षत दो बार नीट की परीक्षा में फेल हो चुका था और वर्तमान में बीकॉम की पढ़ाई कर रहा था। पिता का बार-बार यह कहना कि 'पढ़ाई करो वरना कुछ नहीं बनोगे', उसके भीतर बारूद भर रहा था। घटना वाले दिन भी इसी बात पर बहस शुरू हुई और जब पिता ने उसे डराने के लिए राइफल निकाली, तो अक्षत ने वही राइफल छीनकर उनके माथे पर सटा दी।
शातिर दिमाग और खाकी का चक्रव्यूह
हत्या करने के बाद अक्षत ने किसी पेशेवर अपराधी की तरह सबूत मिटाने की कोशिश की। उसने अपनी 16 साल की मासूम बहन को चार दिन तक बंधक बनाए रखा और उसे जान से मारने की धमकी दी। खुद पुलिस स्टेशन जाकर पिता की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई ताकि किसी को शक न हो। उसने कहानी बुनी कि पिता दिल्ली गए हैं, लेकिन तकनीक और सीसीटीवी के जाल ने उसके झूठ की परतें उधेड़ दीं। फुटेज में पिता घर के अंदर जाते तो दिखे लेकिन बाहर निकलते नहीं। वहीं अक्षत का कार लेकर सुनसान जंगल की तरफ जाना पुलिस के लिए सबसे बड़ा सुराग बना। जब पुलिस घर पहुँची तो घर की फिजा में घुली मौत की गंध ने सब कुछ साफ कर दिया। फॉरेंसिक टीम और पुलिस की सख्ती के आगे कातिल बेटे का हौसला पस्त हो गया और उसने अपने जुर्म की दास्तां खुद बयां कर दी।
ममताविहीन वर्तमान और सहमी हुई मासूमियत
इस पूरी वारदात में सबसे दर्दनाक पहलू मानवेंद्र की छोटी बेटी कृति का है। साल 2017 में माँ को खोने के बाद वह पिता और भाई के सहारे जी रही थी, लेकिन उसके सामने ही उसके भाई ने पिता को खत्म कर दिया। चार दिनों तक वह उसी छत के नीचे खौफ के साये में रही जहाँ उसके पिता का शव टुकड़ों में पड़ा था। पुलिस अब अक्षत के खिलाफ हत्या और साक्ष्य मिटाने की धाराओं में कठोर कार्रवाई कर रही है। सदरौना के जंगलों में फेंके गए अंगों की तलाश और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर केस को मजबूत बनाया जा रहा है। यह घटना समाज के लिए एक चेतावनी है कि कैसे संवाद की कमी और अनियंत्रित गुस्सा हँसते-खेलते परिवारों को श्मशान में तब्दील कर देता है।
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