हापुड़ में एक जनवाणी अखबार के स्थानीय पत्रकार नसीम सिद्दीकी की पीट-पीटकर की गई नृशंस हत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। दीवाली के मौके पर अखबार के लिए विज्ञापन मांगने गए पत्रकार को फ्लोर मिल मालिक अशोक कुमार द्वारा न केवल 'फर्जी' कहकर सरेआम अपमानित किया गया, बल्कि लाठी-डंडों से इतना पीटा गया कि उसने अस्पताल में दम तोड़ दिया। यह दिल दहला देने वाली वारदात महज दो पक्षों के बीच अचानक उपजा कोई मामूली झगड़ा नहीं है, बल्कि उस सड़ी-गली व्यवस्था का नंगा सच है जहां सच को सामने लाने वालों को सबसे लाचार, बेसहारा और असुरक्षित बना दिया गया है। जब कोई पत्रकार अपनी बुनियादी रोजी-रोटी के लिए उसी इलाके के रसूखदारों के सामने हाथ फैलाने को विवश हो जाता है, तो उसकी साख, निष्पक्षता और जिंदगी तीनों एक साथ गंभीर संकट में पड़ जाती हैं।
इस त्रासदी की सबसे बड़ी वजह मीडिया घरानों की वह अंधी और संवेदनहीन नीति है, जो ग्रामीण और कस्बाई पत्रकारों का वर्षों से बेहिसाब आर्थिक शोषण करती आ रही है। बड़े शहरों के वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर ज्ञान बांटने वाले चेहरों से इतर, फील्ड में पसीना बहाने वाले इन तहसील और जिला संवाददाताओं को न तो कोई निश्चित मानदेय मिलता है, न भविष्य निधि और न ही कोई सामाजिक सुरक्षा। उन्हें केवल एक पहचान पत्र थमाकर छोड़ दिया जाता है और खबरों के साथ-साथ त्योहारों पर लाखों रुपयों के विज्ञापन लाने का भारी दबाव बना दिया जाता है। जिस भ्रष्ट व्यापारी, दबंग नेता या बेईमान ठेकेदार के कारनामों की पोल खोलने की जिम्मेदारी रिपोर्टर पर होती है, मजबूरी में उसी के दरवाजे पर विज्ञापन का कटोरा लेकर जाना पड़ता है। इस आर्थिक पराधीनता के चलते स्थानीय रसूखदारों के हौसले इतने बुलंद हो जाते हैं कि वे दिनदहाड़े एक कलमकार की जान लेने में भी नहीं हिचकते।
विडंबना यह भी है कि समाज और पत्रकार के बीच का रिश्ता आज बेहद मतलबी, खुदगर्ज और एकतरफा हो चुका है। जब किसी आम नागरिक की थाने में सुनवाई नहीं होती, राशन की कालाबाजारी होती है, अस्पताल में डॉक्टर नहीं मिलते या कोई दबंग जमीन कब्जाने की कोशिश करता है, तो हर किसी को अपनी लड़ाई लड़ने के लिए सबसे पहले यही पत्रकार याद आता है। रिपोर्टर भी अपनी जान जोखिम में डालकर, माफिया और अफसरों से दुश्मनी मोल लेकर उस जुल्म के खिलाफ आवाज उठाता है। लेकिन जब उसी खबर से तिलमिलाकर बाहुबली या भ्रष्ट तंत्र उस पत्रकार को घेरते हैं और लाठी-डंडों से पीटते हैं, तो पूरा समाज तमाशबीन बनकर अपने घरों की खिड़कियां बंद कर लेता है। जिस कलमकार ने जनता के हक के लिए अपनी गर्दन दांव पर लगाई, उसके लहूलुहान होकर सड़क पर गिरने के बाद कोई पड़ोसी या पीड़ित गवाही देने तक सामने नहीं आता।
दूसरी तरफ, सत्ता और पुलिस-प्रशासन का रवैया ऐसे संवेदनशील मामलों में हमेशा केवल खानापूर्ति और लीपापोती तक सीमित रहता है। घटना के बाद मुकदमा दर्ज कर लेना, कुछ गिरफ्तारियां दिखाना और मौके पर भारी पुलिस बल तैनात कर देना अब एक तयशुदा सरकारी रस्म बन चुका है। डॉक्टरों या अन्य आवश्यक सेवाओं से जुड़े लोगों के लिए तुरंत कड़े कानून बन जाते हैं, लेकिन पत्रकारों की हिफाजत के लिए लंबे समय से उठ रही मांगों को हर बार ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। जब तक कोई निष्पक्ष पत्रकार स्थानीय अधिकारियों या सत्ताधारी नेताओं के मनमुताबिक काम करता है तब तक ठीक है, लेकिन जैसे ही वह सिस्टम की कमियों पर उंगली उठाता है, उसे सुरक्षा देने के बजाय उलटे फर्जी मुकदमों में फंसाकर जेल भेजने का खेल शुरू हो जाता है।
दुनिया के कई देशों में पत्रकारों की सुरक्षा और उनके बुनियादी अधिकारों को लेकर बेहद सख्त और स्पष्ट कानूनी प्रावधान हैं। यूरोप और कई लैटिन अमेरिकी देशों में फील्ड रिपोर्टरों पर हमले को सीधे तौर पर राज्य और लोकतंत्र पर हमला माना जाता है, जहां विशेष अदालतों में त्वरित सुनवाई कर अपराधियों को कड़ी सजा दी जाती है। अपने ही देश में महाराष्ट्र जैसे एक-दो राज्यों ने पत्रकारों और मीडिया संस्थानों पर हमले रोकने के लिए कड़े कानून की पहल की, लेकिन उत्तर प्रदेश सहित देश के अधिकांश हिस्सों में आज भी फील्ड रिपोर्टर बिना किसी कानूनी सुरक्षा घेरे के अपनी जान हथेली पर रखकर काम कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत की लगातार गिरती रैंकिंग भी इस बात का साफ सबूत है कि जमीनी स्तर पर सच बोलने वालों के लिए हालात दिन-ब-दिन कितने खौफनाक होते जा रहे हैं।
इस गहराते संकट से निपटने के लिए अब केवल कोरी संवेदनाओं और बयानों से आगे बढ़कर ठोस और असरदार कदम उठाने होंगे। मीडिया संस्थानों को तुरंत अपनी नीति बदलते हुए फील्ड संवाददाताओं पर विज्ञापन लाने का अनैतिक दबाव पूरी तरह बंद करना होगा। हर फील्ड रिपोर्टर को न्यूनतम सम्मानजनक मानदेय, नियुक्ति पत्र तथा स्वास्थ्य व दुर्घटना बीमा देना कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिए। इसके साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों को बिना किसी देरी के राष्ट्रीय स्तर पर एक कड़ा 'पत्रकार सुरक्षा कानून' लागू करना चाहिए, जिसमें फील्ड पत्रकारों पर हमले को गैर-जमानती अपराध घोषित किया जाए और ऐसे मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक अदालतों में तय समयसीमा के भीतर पूरी हो। जब तक जमीन पर खड़े होकर आम जनता की आवाज उठाने वाले रिपोर्टर को आर्थिक आत्मनिर्भरता, कानूनी हिफाजत और सामाजिक सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक एक आजाद, बेखौफ और निष्पक्ष लोकतंत्र की कल्पना सिर्फ एक छलावा बनकर रह जाएगी।
---समाप्त---