राजधानी के संसद मार्ग इलाके में कानून के रखवालों की शर्मनाक और घिनौनी करतूत सामने आने के बाद भारी जनाक्रोश भड़क उठा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर शनिवार को पटेल चौक से जंतर-मंतर की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को जब पुलिस जबरन हिरासत में ले रही थी, उसी दौरान 'न्यूज डिग्गी' की स्वतंत्र महिला पत्रकार रोजी पर खाकी वर्दी का यह हमला हुआ। रोजी मौके पर आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा को हिरासत में लिए जाने की घटना को कैमरे में कैद कर रही थीं। पीड़िता रोजी का सीधा आरोप है कि दिल्ली पुलिस के एसीपी विवेक भगत ने भीड़ के बीच उनके कपड़े फाड़ दिए और उनके सीने को गलत इरादे से जबरन दबाया, फिर चेहरे पर कुटिल मुस्कान लिए वहां से आगे बढ़ गए। घटना के समय पुलिस ने प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव समेत करीब डेढ़ सौ लोगों को हिरासत में लिया था, लेकिन ऑन-ड्यूटी महिला पत्रकार के साथ दिनदहाड़े हुई इस यौन प्रताड़ना की घटना ने पूरी दिल्ली को झकझोर कर रख दिया।

​संसद मार्ग थाने पर आधी रात तक टकराव

​घटना के तुरंत बाद इंसाफ मांगने संसद मार्ग थाने पहुंची पीड़ित पत्रकार को खाकी के अड़ियल और पक्षपाती रवैये का सामना करना पड़ा। संज्ञेय अपराध होने के बावजूद पुलिस ने आरोपी एसीपी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने से साफ इनकार कर दिया। शाम छह बजते-बजते थाने के बाहर दर्जनों मीडिया संस्थानों के सौ से अधिक स्वतंत्र पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों का हुजूम जुट गया। थाने के मुख्य द्वार पर जेल जैसी भारी बैरिकेडिंग तानकर पुलिस ने पीड़ित को भीतर वकीलों से मिलने तक नहीं दिया। मौके पर मौजूद अधिवक्ता वर्तिका मणि ने कहा कि पीड़िता अंदर अफसरों के घेरे में बेबस थी और वे बाहर चिल्लाते रहे, पुलिस पीड़िता पर बिना वकील के दबाव बनाने की चाल चल रही थी। वहीं अधिवक्ता अनुराधा ने कड़े शब्दों में कहा कि यह संज्ञेय अपराध है, अगर तुरंत मुकदमा दर्ज नहीं हुआ तो अफसर मामले को दो साल तक ठंडे बस्ते में डाल देंगे। मौके पर मौजूद छात्र उज्ज्वल सिंह ने पुलिस के रवैये पर तीखा वार करते हुए कहा कि दिनदहाड़े कैमरे के सामने महिलाओं के कपड़े फाड़ने और छेड़खानी करने वालों पर अगर कार्रवाई नहीं होगी, तो बिना कैमरे के ये क्या करते होंगे। थाने के बाहर यह भी खुलासा हुआ कि सुरक्षा के नाम पर दो अन्य महिलाओं से भी बदसलूकी हुई थी, जबकि स्वतंत्र पत्रकार सुहाना खान को थाने में घुसने तक नहीं दिया गया। सुहाना खान ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि जुलाई के प्रदर्शन में भी उनके साथ मारपीट कर कपड़े फाड़े गए थे और नाम पूछकर उनके निजी अंगों पर हमला किया गया था। पांच घंटे के कड़े विरोध के बाद इंस्पेक्टर रमेश कुमार सिंह ने यह कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की कि ललिता कुमारी फैसला अब लागू नहीं होता और पुलिस चौदह दिन तक शुरुआती जांच करेगी।

सड़क से संसद तक तीखा आक्रोश


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​थाने के बाहर बढ़ते हंगामे के बीच आधी रात को आम आदमी पार्टी के विधायक कुलदीप कुमार मौके पर पहुंचे। उन्होंने सवाल किया कि वर्दी पहनने वाला कानून से ऊपर कैसे हो सकता है और आखिर एसीपी विवेक भगत को कौन बचा रहा है। काफी दबाव के बाद पुलिस ने शिकायत रिसीव की और पीड़िता को मेडिकल जांच के लिए अस्पताल भेजा। इस शर्मनाक घटना को लेकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सीधे गृह मंत्रालय को कटघरे में खड़ा किया। राहुल गांधी ने कहा कि जब महिला पत्रकार बदसलूकी की शिकायत दर्ज कराने घंटों बैठी रही, तब भी पुलिस ने बुनियादी काम नहीं किया। कैमरे छीने गए, पत्रकारों को घसीटा गया और जिस पुलिस पर सुरक्षा की जिम्मेदारी है, वही हाथ उठा रही है। राहुल ने सवाल पूछा कि अमित शाह जी, आखिर आपकी पुलिस किसकी हिफाजत कर रही है। दलित कंटेंट क्रिएटर निशु आजाद ने भी 'बेटी बचाओ' के नारे पर तंज कसते हुए कहा कि जब जनता के सवाल उठाने वाली महिला पत्रकार ही सुरक्षित नहीं है, तो जनता किस पर भरोसा करे। उन्होंने मांग की कि जांच के बाद आरोपी एसीपी की तुरंत गिरफ्तारी हो। अधिवक्ता मुजीबुर रहमान ने कहा कि जमीन पर हकीकत यह है कि पुलिस मुकदमा लिखने से पहले शिकायतकर्ता और आरोपी का ओहदा देखती है। महिला सुरक्षा और खाकी की इस बर्बरता को लेकर विभिन्न नागरिक और प्रेस संगठनों ने आर-पार की लड़ाई का ऐलान करते हुए आगामी चार अक्टूबर को इंडिया गेट से जंतर-मंतर तक बड़े विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है।

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