गोरखपुर विश्वविद्यालय के हॉस्टलों में फैली अव्यवस्थाओं और घटिया भोजन को लेकर राज्य की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल द्वारा जताई गई सख्त नाराजगी का असर अब जमीनी स्तर पर दिखने लगा है। राज्यपाल के कड़े रुख और दिए गए अल्टीमेटम के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन और स्थानीय अमला व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने की हड़बड़ी में जुट गया है। हॉस्टलों में साफ-सफाई, सुरक्षा व्यवस्था और मेस की गुणवत्ता को सुधारने के लिए त्वरित कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य के प्रशासनिक ढांचे और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

​इस पूरे मामले की गंभीरता राज्यपाल के उस बेबाक बयान से रेखांकित होती है जो उन्होंने निरीक्षण के दौरान दिया था। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रबंधन और व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा था:

​"मुख्यमंत्री जी को शायद बुरा भी लगेगा, लेकिन जो हमारी कमियां हैं वह तो मुझे बताना ही पड़ेगा भाई... और यह तो गोरखपुर है जहां स्वयं हमारे मुख्यमंत्री विराजमान हैं, और वहां ही ऐसी कमियां रहेंगी तो क्या होगा?"

​राज्यपाल के इस बयान ने न केवल विश्वविद्यालय प्रशासन की लापरवाही उजागर की, बल्कि राजनीतिक हलकों में भी एक नई बहस को जन्म दे दिया है।


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​संवैधानिक प्रमुख द्वारा मुख्यमंत्री के अपने गृह जिले में इस तरह की खामियों को उजागर किए जाने के बाद से विपक्षी दल लगातार सरकार पर हमलावर हैं। विपक्ष इसे केवल एक विश्वविद्यालय का मामला न मानकर प्रदेश के सभी सरकारी शैक्षणिक संस्थानों की बदहाली का प्रतीक बता रहा है। इस घटनाक्रम के बाद से राजभवन की पैनी नजर विश्वविद्यालय द्वारा की जा रही सुधार प्रक्रिया पर बनी हुई है, जिससे उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारियों पर भी दबाव बढ़ गया है।

​अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राज्यपाल के इस हस्तक्षेप से प्रदेश भर के हॉस्टलों की स्थिति में स्थायी बदलाव आएगा। बीती 6 अगस्त को दिये गए 3 महीने के अल्टीमेटम की समयसीमा शुरू हो चुकी है और विश्वविद्यालय प्रशासन दैनिक आधार पर व्यवस्थाओं की समीक्षा कर रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासनिक सुधारों की यह गति केवल एक विश्वविद्यालय तक सीमित रहती है या पूरे प्रदेश के सरकारी छात्रावासों की दशा बदलने की वजह बनती है।

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