राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर को लेकर पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया पर तरह-तरह की बातें तैर रही हैं। वॉट्सऐप ग्रुपों से लेकर फेसबुक और एक्स पर एक मैसेज तेजी से शेयर हो रहा है। इसमें दावा किया जा रहा है कि 10 अक्टूबर को बजरंग दल, संघ और विहिप के करीब 5 लाख कार्यकर्ता जंतर-मंतर पर इकट्ठा होने वाले हैं। कुछ पोस्टों में तो यहां तक लिख दिया गया कि लोग दिल्ली पहुंचने भी लगे हैं। इस मैसेज के सामने आते ही सियासी गलियारों से लेकर आम लोगों के बीच हलचल मच गई। हर कोई यह जानने की कोशिश में जुट गया कि क्या वाकई 10 तारीख को नई दिल्ली में इतना बड़ा जमावड़ा होने जा रहा है, लेकिन उपलब्ध तथ्यों और नियमों को देखते ही इस पूरे दावे पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे।

क्या है जमीनी हकीकत
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि जंतर-मंतर की जगह असल में कितनी है। कनाट प्लेस के पास वाली यह सड़क महज तीन-चार सौ मीटर लंबी है। आम दिनों में भी अगर यहां कुछ हजार लोग जुट जाएं तो पैर रखने तक की जगह नहीं बचती। ऐसे में पांच लाख लोगों का वहां पहुंचना दूर-दूर तक मुमकिन नहीं दिखता। अगर इतने लोग एक साथ आ जाएं तो पूरी नई दिल्ली की रफ्तार थम जाएगी। इसके अलावा इतने बड़े जमावड़े के लिए हजारों बसों और ट्रेनों की जरूरत पड़ती है, जिसकी कोई तैयारी दिल्ली के किसी कोने में नजर नहीं आ रही। साफ है कि सोशल मीडिया पर शेयर हो रहा यह आंकड़ा सिर्फ सनसनी फैलाने के लिए गढ़ा गया है।

क्या कहते हैं सरकारी नियम
जंतर-मंतर पर किसी भी तरह के धरने या प्रदर्शन के लिए नियम-कायदे बेहद सख्त हैं। सुप्रीम कोर्ट के 2018 के ऐतिहासिक फैसले के तहत यहां किसी भी विरोध प्रदर्शन में एक समय में अधिकतम 1,000 लोगों के जुटने की ही कानूनी सीमा तय की गई है। अगर भीड़ इससे ज्यादा हो, तो आयोजकों को रामलीला मैदान या बुराड़ी ग्राउंड का रुख करना पड़ता है। इसके अलावा, संसद भवन और अन्य संवेदनशील दफ्तरों के नजदीक होने की वजह से नई दिल्ली जिले में सुरक्षा के कड़े इंतजाम रहते हैं। यहां किसी भी कार्यक्रम के आयोजन के लिए स्थानीय डीसीपी कार्यालय से कई दिन पहले लिखित अनुमति और ट्रैफिक पुलिस से एनओसी लेना कानूनी रूप से अनिवार्य होता है। जब भी दिल्ली में किसी बड़े जमावड़े की संभावना होती है, तो पुलिस बाकायदा कई दिन पहले रूट डायवर्जन और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सार्वजनिक ट्रैफिक एडवाइजरी जारी करती है। मौजूदा समय में न तो प्रशासन की तरफ से ऐसी कोई सूचना आई है और न ही जमीनी स्तर पर कोई विशेष हलचल दिखाई दे रही है। ऐसे में बिना किसी आधिकारिक मंजूरी, सुरक्षा बंदोबस्त या ट्रैफिक एडवाइजरी के इतने बड़े पैमाने पर लोगों के जुटने की बात नियमों और हकीकत की कसौटी पर कहीं से भी खरी नहीं उतरती।

कहां से उड़ी बात
असल में 10 अक्टूबर को चुनाव आयोग के खिलाफ कुछ युवा और विपक्षी संगठनों ने जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया था। इसी को लेकर दोनों पक्षों के बीच सोशल मीडिया पर बयानबाजी शुरू हो गई। देखते ही देखते कुछ लोगों ने अपनी तरफ से भारी भीड़ जुटने का मनगढ़ंत दावा जोड़ दिया और मैसेज वायरल कर दिया। संघ या विहिप जैसे संगठनों ने भी अपनी तरफ से दिल्ली कूच का ऐसा कोई ऐलान नहीं किया है।
पड़ताल का नतीजा
प्रशासनिक नियमों, सुरक्षा व्यवस्था और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर जब इस पूरे घटनाक्रम को परखा गया, तो यह साफ हो जाता है कि 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर 5 लाख लोगों के जुटने की बात में कोई सच्चाई नहीं है। जगह की सीमित क्षमता, सुप्रीम कोर्ट की 1,000 लोगों की कानूनी सीमा और किसी भी आधिकारिक मंजूरी का न होना यह साबित करता है कि यह सिर्फ इंटरनेट पर माहौल गर्म करने के लिए फैलाई गई एक कोरी अफवाह है। आम लोगों को ऐसे भ्रामक और बिना सिर-पैर वाले संदेशों पर भरोसा करने से बचना चाहिए।
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