पश्चिम बंगाल की राजनीति और न्यायपालिका के गलियारों में शुक्रवार को उस समय हड़कंप मच गया जब कलकत्ता उच्च न्यायालय में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा दायर एक अत्यंत संवेदनशील याचिका पर सुनवाई होनी थी। यह याचिका राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग से जुड़ी थी। हालांकि, अदालत कक्ष में हुए भारी हंगामे और अव्यवस्था के कारण न्यायाधीश को सुनवाई स्थगित करनी पड़ी। अब इस मामले पर 14 जनवरी, 2026 को सुनवाई होने की संभावना व्यक्त की गई है।

अदालत कक्ष में अव्यवस्था का माहौल

​शुक्रवार को जैसे ही मामले की पुकार हुई, कोर्ट रूम वकीलों और अन्य लोगों की भारी भीड़ से भर गया। स्थिति इतनी अनियंत्रित हो गई कि न्यायाधीश ने खुले तौर पर नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि शोर-शराबे के कारण बेंच तक वकीलों की आवाज नहीं पहुँच पा रही थी और कुछ भी स्पष्ट सुनाई नहीं दे रहा था। सुरक्षाकर्मियों द्वारा कोर्ट रूम खाली कराने के प्रयासों के बावजूद, शोर कम नहीं हुआ, जिसके चलते अदालत को कार्यवाही स्थगित करने का कड़ा फैसला लेना पड़ा।

ईडी के आरोप: मुख्यमंत्री और पुलिस की 'साठगांठ'

​ईडी ने अपनी 28 पन्नों की व्यापक याचिका में पश्चिम बंगाल सरकार पर तीखा हमला बोला है। एजेंसी का मुख्य आरोप है कि राज्य पुलिस ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ मिलीभगत की है। ईडी ने कहा कि 8 जनवरी को जब उनके अधिकारी कोलकाता में तलाशी अभियान चला रहे थे, तब पुलिस ने "कानून की घोर अवहेलना" की और अपने सार्वजनिक कर्तव्यों का निर्वहन करने के बजाय केंद्रीय एजेंसी के काम में बाधा उत्पन्न की।

​याचिका में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि राज्य प्रशासन ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के प्रावधानों का उल्लंघन किया है। ईडी के अनुसार, यह याचिका न केवल कानूनी कार्रवाई के लिए है, बल्कि राज्य प्रशासन के कामकाज में "जनता का विश्वास जगाने" और मुख्यमंत्री द्वारा किए जा रहे "अतिचार" को तुरंत रोकने के लिए उच्च न्यायालय से संवैधानिक हस्तक्षेप की मांग करती है।


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I-PAC तलाशी और साक्ष्यों को नष्ट करने का दावा

​इस पूरे विवाद का केंद्र राजनीतिक परामर्श फर्म I-PAC और उसके निदेशक प्रतीक जैन का निवास स्थान है। ईडी ने याचिका में सनसनीखेज आरोप लगाया है कि कोयला तस्करी मामले की जांच के दौरान जब वे साक्ष्य एकत्र कर रहे थे, तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्वयं परिसर में प्रवेश किया।

​ईडी के दस्तावेज़ के अनुसार दोपहर लगभग 12:05 बजे, मुख्यमंत्री दक्षिण कोलकाता स्थित तलाशी परिसर में दाखिल हुईं। अधिकारियों ने उनसे पीएमएलए, 2002 की धारा 17 के तहत चल रही कार्यवाही में हस्तक्षेप न करने का अनुरोध किया, लेकिन उन्होंने इसे अनसुना कर दिया। आरोप है कि मुख्यमंत्री ने पुलिसकर्मियों की सहायता से अधिकृत अधिकारियों के कब्जे से डिजिटल उपकरण और "महत्वपूर्ण आपत्तिजनक दस्तावेज" जबरन छीन लिए। याचिका में दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री इन महत्वपूर्ण फाइलों और उपकरणों को अपनी निजी कार में रखकर परिसर से ले गईं। यह घटना न केवल प्रतीक जैन के आवास पर बल्कि I-PAC के बिधाननगर स्थित मुख्य कार्यालय में भी घटित हुई।

20 करोड़ का हवाला और कोयला तस्करी कनेक्शन

​ईडी ने इस छापेमारी के पीछे के वित्तीय कारणों का भी खुलासा किया है। जांच एजेंसी का दावा है कि उनके पास ऐसे "ठोस सबूत" हैं जो दर्शाते हैं कि कम से कम 20 करोड़ रुपये की आपराधिक आय (Proceeds of Crime) हवाला चैनलों के माध्यम से I-PAC को हस्तांतरित की गई थी।

​यह पूरी कार्रवाई 27 नवंबर, 2020 को सीबीआई द्वारा अनुप मजी और अन्य के खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर पर आधारित है। ईडी ने स्पष्ट किया कि यह तलाशी किसी चुनाव से संबंधित नहीं है और न ही इसका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल को निशाना बनाना है, बल्कि यह मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ एक नियमित और साक्ष्य-आधारित वैधानिक प्रक्रिया है।

पुलिस की भूमिका पर सवाल

​ईडी ने याचिका में अधिकारियों के नाम भी शामिल किए हैं। उल्लेख किया गया है कि दक्षिण कोलकाता के डीसीपी आईपीएस प्रियोब्रतो और पुलिस आयुक्त आईपीएस मनोज कुमार वर्मा परिसर में दाखिल हुए थे। एजेंसी का आरोप है कि पुलिस ने ईडी अधिकारियों को निशाना बनाने के लिए "दुर्भावनापूर्ण तरीके" से कई एफआईआर दर्ज की हैं ताकि उन्हें आपराधिक रूप से डराया जा सके।

​ईडी ने कोर्ट से प्रार्थना की है कि वह राज्य पुलिस और मुख्यमंत्री की "अतिवादी कार्रवाई" पर तत्काल रोक लगाए। एजेंसी ने जोर देकर कहा कि 8 जनवरी, 2026 को तैयार किए गए 'पंचनामा' में इन सभी अवैध हस्तक्षेपों को दर्ज किया गया है।

​अब सबकी निगाहें 14 जनवरी पर टिकी हैं, जब उच्च न्यायालय इस बात पर निर्णय ले सकता है कि क्या किसी राज्य की मुख्यमंत्री के खिलाफ इस तरह के आरोपों पर एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए जा सकते हैं या नहीं। यह मामला न केवल कानूनी बल्कि संवैधानिक दृष्टि से भी केंद्र-राज्य संबंधों के बीच एक नया विवाद खड़ा कर चुका है।

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