रामपुर, 5 नवंबर। जनपद के उत्तराखंड बॉर्डर स्थित भानु प्रताप पब्लिक स्कूल परिसर में इस बार दिवाली का स्वागत अनोखे और रचनात्मक अंदाज में हुआ। स्कूल में नर्सरी से लेकर 11वीं कक्षा तक के छात्र-छात्राओं के लिए खास मिट्टी कला कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस पहल का मुख्य उद्देश्य बच्चों को किताबी दुनिया से बाहर निकालकर अपनी पुरानी भारतीय शिल्पकला से जोड़ना और अपने हाथों से काम करने का हुनर सिखाना था। पूरे परिसर में माटी की भीनी खुशबू के बीच बच्चों का उत्साह देखते ही बनता था।

​नन्हें हाथों ने दिया मिट्टी को सुंदर आकार

​कार्यशाला के लिए एक कुशल कुम्हार को चाक और आवश्यक मिट्टी के साथ स्कूल बुलाया गया। उन्होंने बच्चों को समझाया कि कैसे गीली मिट्टी को गूंथकर चाक पर उतारा जाता है और हल्के हाथों के दबाव से उसे सुंदर आकार दिया जाता है। खेल के पीरियड के दौरान खेल शिक्षकों की देखरेख में सभी कक्षाओं के छात्रों ने बारी-बारी से इसमें भाग लिया। बच्चों ने केवल पारंपरिक दीये ही नहीं बनाए, बल्कि अपनी कल्पना से छोटे-छोटे गमले, खिलौने और कई तरह के सजावटी बर्तन भी तैयार किए।

​बच्चों ने जाना कैसे बनते हैं मिट्टी के दिये


Advertisement

​गीली मिट्टी को हाथ में थामकर काम करते समय नन्हे बच्चों के चेहरे पर एक अलग ही चमक नजर आई। जब चाक पर घूमती मिट्टी ने एक दीये का रूप लिया, तो छात्र खुशी से झूम उठे। बच्चों ने इस बात को करीब से समझा कि बाजार में मिलने वाले एक साधारण दीये के पीछे किसी हुनरमंद कारीगर की कितनी मेहनत छिपी होती है। इस अनुभव ने बच्चों के मन में स्थानीय कला और कामगारों के प्रति सम्मान की भावना को और गहरा किया।

​व्यावहारिक शिक्षा से सर्वांगीण विकास

​स्कूल के प्रधानाचार्य महेश चंद्रा ने छात्रों की रचनात्मकता की सराहना करते हुए कहा कि शिक्षा का सही मकसद केवल परीक्षाओं में अंक लाना नहीं है। जब बच्चे किताबों के सिद्धांतों को खुद अपने हाथों से आजमाते हैं, तो उनका आत्मविश्वास तेजी से बढ़ता है। उन्होंने बताया कि इस तरह की प्रायोगिक गतिविधियों से बच्चों में समस्याओं को खुद हल करने की आदत बनती है, उनकी सोचने की क्षमता तेज होती है और वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हैं। हाथ से काम करने से छात्रों का ध्यान केंद्रित रहता है और वे भविष्य के लिए व्यावहारिक रूप से तैयार होते हैं।

---समाप्त---