बलूचिस्तान की धरती एक बार फिर रक्त रंजित हो उठी है और इस बार पाकिस्तानी सेना को वह जख्म मिला है जिसकी भरपाई निकट भविष्य में संभव नहीं दिखती। बीएलए विद्रोहियों द्वारा किए गए सुनियोजित और घातक हमलों ने न केवल 80 सैनिकों की जान ले ली है बल्कि इस्लामाबाद के उन दावों की भी पोल खोल दी है जिनमें वह क्षेत्र में शांति बहाली की बात करता रहा है। प्रतिबंधित संगठन बलूच लिबरेशन आर्मी द्वारा अंजाम दी गई यह कार्रवाई पिछले कई दशकों का सबसे बड़ा हमला माना जा रहा है। विद्रोहियों ने आधुनिक सैन्य साजो-सामान और सटीक रणनीति का परिचय देते हुए पाकिस्तानी सेना की चौकियों और रसद काफिलों को जिस तरह निशाना बनाया है, उससे यह स्पष्ट हो गया है कि बलूच विद्रोह अब एक नए और अधिक खतरनाक चरण में प्रवेश कर चुका है। यह हमला केवल एक आतंकी घटना नहीं है बल्कि उस संचित आक्रोश का परिणाम है जो दशकों से बलूच नागरिकों के बीच अपने संसाधनों के दोहन और दमनकारी नीतियों के विरुद्ध पनप रहा था।
वैश्विक ध्यान भटकाने के लिए भारत विरोधी पैंतरेबाजी
अपनी खुफिया तंत्र की विफलता और जमीनी स्तर पर सुरक्षा चूक को ढकने के लिए पाकिस्तान ने हमेशा की तरह अपनी पुरानी और घिसी-पिटी पटकथा का सहारा लिया है। बिना किसी साक्ष्य या अंतरराष्ट्रीय जांच के पाकिस्तानी हुक्मरानों ने इस हमले की साजिश का केंद्र भारत को बताना शुरू कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में इसे पाकिस्तान की 'झुंझलाहट भरी प्रतिक्रिया' के रूप में देखा जा रहा है। जब भी पाकिस्तान अपने भीतर उठने वाली स्वायत्तता की आवाजों को दबाने में नाकाम रहता है या उसकी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ता है, तो वह घरेलू जनता का ध्यान भटकाने के लिए 'विदेशी हाथ' का कार्ड खेलने लगता है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने पूर्व में भी स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान को अपनी समस्याओं के लिए दूसरों पर उंगली उठाने के बजाय अपने घर में पल रहे आतंकवाद के कारखानों को बंद करना चाहिए। यह आरोप केवल अपनी जनता को गुमराह करने और सेना के गिरते मनोबल को सहारा देने का एक असफल प्रयास मात्र है।
सीपेक की सुरक्षा और चीन का बढ़ता हुआ दबाव
इस हमले का सबसे बड़ा प्रभाव चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी सीपेक पर पड़ता दिखाई दे रहा है। बलूचिस्तान वह केंद्र है जहां चीन ने अरबों डॉलर का निवेश किया है और अब अपने नागरिकों तथा निवेश की सुरक्षा को लेकर बीजिंग की चिंताएं चरम पर हैं। 80 सैनिकों के हताहत होने के बाद पाकिस्तान पर चीन का दबाव बढ़ना स्वाभाविक है क्योंकि यह हमला दर्शाता है कि पाकिस्तानी सेना ग्वादर और उससे सटे इलाकों में पूर्ण सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम नहीं है। बलूच विद्रोहियों का मुख्य विरोध इसी आर्थिक गलियारे को लेकर है जिसे वे अपनी जमीन और समुद्री संसाधनों की लूट का जरिया मानते हैं। पाकिस्तान अब एक दोराहे पर खड़ा है जहां उसे या तो बलूच नागरिकों की जायज मांगों पर विचार करना होगा या फिर इसी तरह के भीषण सैन्य टकरावों के लिए तैयार रहना होगा। भारत पर आरोप मढ़कर पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति तो नहीं बटोर पाएगा लेकिन इससे उसकी आंतरिक दरारें और गहरी होती जाएंगी।
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