उत्तर प्रदेश में 'बुलडोजर संस्कृति' और प्रशासनिक मनमानी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐसा प्रहार किया है जिसकी गूंज शासन के गलियारों में लंबे समय तक सुनाई देगी। जस्टिस आलोक माथुर की पीठ ने रायबरेली के एक मामले में न केवल अवैध तोड़फोड़ को असंवैधानिक करार दिया, बल्कि राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी करते हुए 20 लाख रुपये का अनुकरणीय जुर्माना भी ठोक दिया। यह फैसला उन अधिकारियों के लिए एक चेतावनी है जो खुद को कानून से ऊपर समझने की भूल कर रहे हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि न्याय केवल कागजों पर नहीं होगा, बल्कि उस नागरिक को आर्थिक मुआवजा भी मिलेगा जिसकी छत प्रशासनिक अहंकार की भेंट चढ़ गई।

सुनवाई का हक छीना और पीछे से चलाया बुलडोजर

मामले की तह में जाने पर सरकारी तंत्र की जो डरावनी तस्वीर सामने आई है, वह किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए चिंताजनक है। याचिकाकर्ता सावित्री सोनकर ने वैध तरीके से जमीन खरीदी थी और राजस्व अभिलेखों में उनका नाम दर्ज था। लेकिन अधिकारियों ने रातों-रात यूपी रेवेन्यू कोड की धारा 38(5) का दुरुपयोग करते हुए एकतरफा आदेश पारित किया और बिना किसी पूर्व सूचना के ढांचा ढहा दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि अधिकारियों को पुराने अदालती आदेशों की पूरी जानकारी थी, फिर भी उन्होंने जानबूझकर उनकी अनदेखी की। यह कार्रवाई न केवल द्वेषपूर्ण थी, बल्कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तोड़फोड़ के संबंध में निर्धारित स्पष्ट दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन भी थी।

अक्षम अधिकारियों की फौज और प्रशिक्षण की भारी कमी


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हाईकोर्ट की सबसे तीखी टिप्पणी तहसील और सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट के आचरण पर रही। कोर्ट ने हैरानी जताते हुए कहा कि जिले के वरिष्ठ राजस्व अधिकारी अपने अधिकारों और कर्तव्यों से इस कदर अनजान हैं कि उन्हें न्यायिक प्रक्रिया की बुनियादी समझ भी नहीं है। यह केवल एक संपत्ति का मामला नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण उत्तर प्रदेश की उस विशाल आबादी के अधिकारों का सवाल है जो इन अधिकारियों के रहमोकरम पर टिकी है। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि वह अपने अधिकारियों को प्रशिक्षित करे, ताकि वे कानून के रक्षक बनें, भक्षक नहीं।

दोषी अधिकारियों की जेब से वसूला जाएगा हर्जाने का पैसा

न्याय की मिसाल पेश करते हुए हाईकोर्ट ने सिर्फ जुर्माना लगाकर औपचारिकता पूरी नहीं की। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस पूरे मामले की गहन जांच करे और उन विशिष्ट अधिकारियों की पहचान करे जो इस अवैध कृत्य के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार थे। कोर्ट का आदेश स्पष्ट है कि 20 लाख रुपये की यह राशि सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि उन दोषी अधिकारियों की जेब से वसूली जानी चाहिए। जमीन का कब्जा तुरंत वापस सौंपने का आदेश देते हुए कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया है कि 'कानून का शासन' किसी भी सत्ता या पद से बड़ा होता है।

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