उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले से एक ऐसी सनसनीखेज साजिश का खुलासा हुआ है, जिसने सुरक्षा एजेंसियों, जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग के होश उड़ा दिए हैं। यह कहानी एक ऐसी महिला की है जिसने न केवल सरहद पार जाकर अपनी राष्ट्रीयता बदली, बल्कि वापस लौटकर तीन दशकों तक भारतीय सरकारी तंत्र की आंखों में धूल झोंकी। मामला माहिरा उर्फ फरजाना का है, जिसने 1979 में पाकिस्तान के सिबगत अली से निकाह किया था। निकाह के बाद वह पाकिस्तान चली गई और वहां की नागरिकता के साथ पाकिस्तानी पासपोर्ट भी हासिल कर लिया। पाकिस्तान में दो बेटियों को जन्म देने और फिर पति से तलाक होने के बाद वह पाकिस्तानी पासपोर्ट पर ही भारत लौटी थी। लेकिन भारत वापसी के बाद उसने जो खेल खेला, उसने देश की सुरक्षा और प्रशासनिक पारदर्शिता की धज्जियां उड़ा कर रख दीं।
दोहरी पहचान और दूसरी शादी का शातिर जाल
भारत लौटने के बाद माहिरा ने अपनी पाकिस्तानी पहचान को पूरी तरह दफन कर दिया और एक बार फिर अपनी पुरानी भारतीय पहचान 'फरजाना' को जिंदा कर लिया। इस साजिश को सामाजिक और कानूनी रूप से पुख्ता करने के लिए उसने वर्ष 1985 में रामपुर में ही दूसरी शादी कर ली। यह कदम इसलिए उठाया गया ताकि समाज और कागजों में उसकी स्थिति एक सामान्य भारतीय नागरिक जैसी दिखाई दे और किसी को उसके विदेशी होने का संदेह न हो। चौंकाने वाली बात यह है कि माहिरा की प्रारंभिक शिक्षा और बीटीसी का प्रशिक्षण पूर्व में रामपुर से ही हुआ था। अपनी इसी पुरानी शैक्षिक योग्यता का लाभ उठाकर उसने 1992 में बेसिक शिक्षा विभाग में सरकारी शिक्षिका की नौकरी हासिल कर ली। उसने विभाग को यह कभी नहीं बताया कि वह वैधानिक रूप से पाकिस्तान की नागरिक बन चुकी है और पाकिस्तानी पासपोर्ट पर भारत आई है।

प्रशासनिक चूक और निवास प्रमाण पत्र का काला सच
इस पूरे फर्जीवाड़े का सबसे हैरान करने वाला पहलू वर्ष 1991 में सामने आया, जब रामपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी कार्यालय द्वारा उसे निवास प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया। एक विदेशी नागरिक, जो पाकिस्तानी पासपोर्ट पर भारत में रह रही थी, उसे भारतीय निवास प्रमाण पत्र मिलना सुरक्षा तंत्र की बहुत बड़ी और अक्षम्य विफलता थी। इसी निवास प्रमाण पत्र को ढाल बनाकर उसने सरकारी शिक्षक के पद पर अपनी दावेदारी पेश की और 22 जनवरी 1992 को नियुक्ति पत्र हासिल कर लिया। यह सरकारी खजाने पर सीधे डाका डालने जैसा था, जहां एक विदेशी नागरिक भारतीय करदाताओं के पैसे से वेतन उठा रही थी। हालांकि, 1993 में लोकल इंटेलिजेंस यूनिट (एलआईयू) ने विदेशी अधिनियम के तहत उसके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी, जिसके बाद विभाग ने उसे सेवा से बर्खास्त भी किया था, लेकिन वह कानूनी पेचों का सहारा लेकर बचती रही।
33 साल बाद जागा विभाग और अब कानूनी हंटर
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि बर्खास्तगी के बावजूद आपराधिक मुकदमा दर्ज होने में 33 साल का लंबा वक्त क्यों लगा? अब जाकर शासन से कड़े निर्देश प्राप्त होने के बाद वर्तमान बेसिक शिक्षा अधिकारी कल्पना देवी ने पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस अधीक्षक विद्यासागर मिश्र ने पुष्टि की है कि थाना अजीमनगर में धोखाधड़ी और नागरिकता छिपाने की गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। यह केस न केवल एक शिक्षिका के फर्जीवाड़े का है, बल्कि यह उन सभी कड़ियों की जांच का विषय है जिन्होंने एक पाकिस्तानी नागरिक को भारतीय दस्तावेज बनाने में मदद की। अब पुलिस इस बात की गहराई से तफ्तीश कर रही है कि 1992 से लेकर अब तक उसे किन-किन लोगों का संरक्षण प्राप्त था और इतने सालों तक यह फाइल दबी क्यों रही।
---समाप्त---